8.11.09

वसुधैव कुटुम्बकम?

दुनिया भर में फैले हुए प्रवासी भारतीय हिन्दुओं को यदि उन देशों के बहुसंख्यक लोग गोमांस खाने पर मजबूर करने लगे तो उन्हे कैसा लगेगा। यदि वो अपनी मरजी से ऐसा करते हैं तो किसी को कोई आपत्ति क्यों होगी लेकिन यदि उन पर यह बाध्य कर दिया जाय कि यदि उस देश में रहना होगा तो गोमांसाहारी बनना होगा तो उन को कैसा महसूस होगा और आप को कैसा महसूस होगा? *

भारत में मुसलमान तेरह चौदह सौ साल से रह रहे हैं। कोई भारतीय मुसलमान विदेशी नहीं है, इस भूमि पर उसका भी इतना ही हक़ है जितना कि किसी और का। वे अपने वतन को किस तरह से प्यार करेंगे और किस तरह उसका प्रदर्शन करेंगे यह तय करने वाला कोई और नहीं वे खुद होंगे। यदि कोई दीनी तंजीम यह तय करती है कि यह गीत उनके धर्म के आड़े आता है और वे वन्दे मातरम का गान नहीं करना चाहते तो इसमें किसी को ऐतराज़ कैसा?

यह गीत देशभक्ति का कोई पैमाना नहीं है। देशभक्ति की आड़ में देशवासियों से नफ़रत करना यह कैसी नीति है? इस गीत को गाने से या न गाने से देश का क्या हानि-लाभ हो जा रहा है? यह कोई मुद्दा ही नहीं है। इस बात पर विवाद करना वितण्डा खड़ा करना और साम्प्रदायिक भावनाओं को भड़काने की साज़िश है।

हर धार्मिक व्यक्ति साम्प्रदायिक नहीं होता, जैसे कि हर साम्प्रदायिक व्यक्ति धार्मिक नहीं होता (आडवाणी जी इस का सबसे बड़ा प्रमाण हैं)।

वसुधैव कुटुम्बकम का नारा देने वाले पहले देश के लोगों के साथ कुटुम्ब के सदस्यों के तौर पर सम्मान करना सीखें, ये हिटलरी नीति छोड़ें और विचारों और मान्यताओं के वैविध्य के लिए जगह बनाएं।

(जन गण मन और वन्दे मातरम पर यहाँ और पढ़ें!)

* यह प्रवासी का उदाहरण इसलिए दिया है कि वे भारत में बहुसंख्यक और किसी भी अन्य देश में पहले प्रवासी है फिर अल्पसंख्यक।

7.11.09

फ़ूको बनाम चॉम्स्की

फ़ूको : बजाय सामाजिक संघर्षों को ‘न्याय’ की दृष्टि से समझने के, हमें न्याय को सामाजिक संघर्ष के नज़रिये से देखना चाहिये ..

.. सर्वहारा शासक वर्ग के खिलाफ़ इसलिए युद्ध नहीं छेड़ता क्योंकि ये एक इंसाफ़ की लड़ाई है। सवर्हारा शासक वर्ग के विरुद्ध युद्ध करता है क्योंकि, इतिहास में पहली बार, वह सत्ता हथियाना चाहता है। और क्योंकि वो शासक वर्ग की सत्ता को उखाड़ फेंकेगा इसलिए वह इस लड़ाई को न्यायपूर्ण समझता है।

चॉम्स्की : मैं सहमत नहीं हूँ।

फ़ूको : आदमी लड़ाई जीतने के लिए लड़ता है, न्याय के विचार से नहीं।

चॉम्स्की : निजी तौर पर मैं इस बात से सहमत नहीं हूँ।
मिसाल के तौर पर, अगर मुझे लगता है कि सर्वहारा के द्वारा सत्ता पर क़ब्ज़े से एक आतंकवादी पुलिस राज्य का जनम होगा जिसमें आज़ादी और सम्मान और मानवीय सम्बन्धों की गरिमा नष्ट हो जाएगी, तो मैं नहीं चाहूँगा कि सर्वहारा सत्ता में आए। असल में, ऐसा चाहने के पीछे का एकमात्र कारण, मेरे मत से, यह है कि आदमी सोचता है, सही या ग़लत, कि ऐसे सत्ता परिवर्तन से कुछ मूलभूत मानवीय मूल्य हासिल किए जा सकेंगे।

फ़ूको : जब सर्वहारा सत्ता हासिल करता है, तो बहुत मुमकिन है कि सवर्हारा जिन वर्गो पर विजयी हुआ है, उनके प्रति एक हिंस्र, तानाशाही भरी और खूनी ताक़त का इस्तेमाल करे। मैं नहीं समझ पाता कि इस में किसी को क्या आपत्ति हो सकती है।
लेकिन अगर आप मुझ से पूछें कि वे कौन से हालात होंगे कि सर्वहारा एक हिंस्र, तानाशाही भरी और खूनी ताक़त का इस्तेमाल करे, तो मैं कहूँगा कि यह तभी सम्भव है जब कि सत्ता सर्वहारा के हाथ में आई ही नहीं, बल्कि सर्वहारा से बाहर का कोई वर्ग, सर्वहारा के भीतर का कोई दल, किसी तरह की नौकरशाही या मध्यवर्ग (पेटी बुर्ज़ुआ) के तत्वों ने सत्ता हथिया ली है।

चॉम्स्की : मैं आप की क्रांति की अवधारणा से कई ऐतिहासिक और दूसरे भी कारणों से ज़रा भी मुतमईन नहीं हूँ। मगर फिर भी यह मान लिया जाय, तर्क के लिए, कि अवधारणा के अनुसार यह सही है कि सर्वहारा सत्ता हथिया ले और उसका अन्यायपूर्ण तरीक़े से खूनी और हिंस्र प्रयोग करे, क्योंकि यह दावा किया गया है, जो कि मेरी समझ से ग़लत दावा है, कि ऐसा करने से एक अधिक न्यायपूर्ण समाज बनेगा, जिस समाज में राज्य का विलोप हो जाएगा, सर्वहारा एक सार्वभौमिक वर्ग होगा, और न जाने क्या-क्या। गर यह न्यायसंगत उद्देश्य न हो, तो सर्वहारा की इस तरह की हिंस्र और रक्तरंजित तानाशाही निश्चित ही अन्याय होगी। अब यह अन्य मामला है कि मुझे इस हिस्र और रक्तरंजित तानाशाही के विचार के प्रति बहुत शंकाएं हैं, खासकर तब जब कि वो किसी हिरावल पार्टी के स्वनियुक्त प्रतिनिधि की तरफ़ से आएं, जो, हम एक लम्बे ऐतिहासिक अनुभव से पहले से ही जानते हैं, कि इस ‘नए’ समाज पर नए शासक होंगे।

(१९७१ में फ़ूको और चॉम्स्की के बीच एक बहस का अंश)

पू्री बहस यहाँ पर पढ़ें या यहाँ देखें

4.11.09

खरगोश : नारेबाज़ी नहीं कला

एक खुशखबरी यह है कि मेरे मित्र परेश कामदार की फ़िल्म खरगोश को ओसियान फ़िल्म फ़ेस्टिवल में पुरस्कार मिल गया है। और एक नहीं चार पुरस्कार मिल गए हैं: ज्यूरी पुरस्कार, अन्तर्राष्ट्रीय क्रिटिक पुरस्कार, ऑडियेन्स पुरस्कार, और नेटपैक पुरस्कार। किसी भी फ़िल्म के लिए चार अलग-अलग ज्यूरी के दिलों में अपनी जगह बनाना आसान नहीं होता, खरगोश ने यह करिश्मा कर दिखाया है।

कथाकार प्रियंवद की कहानी पर बनी यह फ़िल्म के केन्द्र में एक दस बरस के बच्चे की दुनिया और उसका नज़रिया है। उसके दुनिया में माँ है, उसके अध्यापक हैं, स्कूल है, सहपाठी हैं, एक कठपुतली वाला है, मोहल्ले की गलियाँ हैं, पीछे के खेत और खेतों के पार का जंगल है, मन के भीतर एक और बड़ा जंगल है, और सबसे बढ़कर उसके घर में किरायेदार भैया है, उनकी मोटरसाइकिल है, और मोहल्ले की छतों के आर-पार संचालित होने वाला प्रेम और उसका लक्ष्य नायिका - भैया की प्रेमिका है। मासूम बच्चा इन दो नौजवानों के प्रेम का क़ासिद बनता है और जाने कब से क़ासिद से रक़ीब की हैसियत में आने लगता है, उसे खुद पता नहीं लगता। एक तरह से यह एक बच्चे के भीतर काम के प्रस्फुटन का कलात्मक लेखा है।

खरगोश परेश भाई की तीसरी फ़िल्म है। इसके पहले वे एन एफ़ डी सी के प्रायोजन से टुन्नु की टीना और जुगाड़े हुए स्रोतों व दोस्तों-यारों के प्रायोजन से 'जॉनी-जॉनी येस पापा' बना चुके हैं। टुन्नु की टीना ने बर्लिन तक का सफ़र भी किया, और दूरदर्शन के छोटे पर्दे पर भी उसे जगह मिली। जॉनी-जॉनी येस पापा इतनी भाग्यशाली नहीं रही, तीन-चार साल से बन कर तैयार है लेकिन अभी तक वितरण नहीं हो सका है। परेश भाई एफ़ टी आई आई ने सम्पादन में डिप्लोमा हासिल किया है और कुमार शाहणी के साथ भी काम करते रहे हैं, बाद के वर्षों में टी वी पर सीरियलों का निर्देशन भी किया। लेकिन अच्छी बात ये रही कि बावजूद पैसे के लालच के टीवी की दुनिया में रमे नहीं और कला का जोखिम उठाया। (आजकल कला का जोखिम महज़ अभिव्यक्ति का ही जोखिम नहीं, अस्तित्व का जोखिम भी बनता है) उनकी पत्नी और मेरी सहपाठी रह चुकीं गज़ाला नरगिस ने भी उन्हे इस राह पर बढ़ चलने के लिए उत्साहित बनाए रखा। उनके सहयोग के बिना यह सफ़र बहुत मुश्किल हो सकता था। और धन्यवाद है ऋषि चन्द्रा जैसे निर्माता को जिसने परेश जी को अपनी समझ से एक अच्छी फ़िल्म बनाने की पूरी आज़ादी दी।

फ़िल्म पिछले वर्ष ही बन कर तैयार हो गई थी और मुम्बई में हुए तमाम ट्रायल शो में से एक ट्रायल में मैंने भी इसका आस्वादन किया। इस तरह की फ़िल्में भारत में कम ही बनी हैं और सन अस्सी के बाद तो बिलकुल ही नहीं बनीं। असल में समान्तर सिनेमा के नाम पर भारत में जो सिनेमा बनाया गया वह मोटे तौर पर सामाजिक सच्चाई का सिनेमा था। सिनेमाई कला की बरीक़ियों का अनुसंधान और संधान करने वाले सिनेमा के साधक कम ही रहे। सत्यजित राय, ऋत्विक घटक और बिमल राय, कला और सामाजिक सच्चाई को संतुलित करते रहे। लेकिन धीरे-धीरे कला पिछड़ती गई और जिसे कथ्य कहा जाता है उसकी धार भोथरी होती गई। (बहुत लोग मानते हैं कि शिल्प और कथ्य दो अलग-अलग हस्तियाँ हैं, पर इस मसले पर मैं गोदार का मुरीद हूँ जो मानते थे कि कथ्य शिल्प की अन्तर्वस्तु है और शिल्प कथ्य का आवरण)

मुख्यधारा के सिनेमा ने ही सामाजिक परिवर्तन को एक मसाले की तरह अख्तियार कर लिया और अगर आप भूले न हो तों मेरी आवाज़ सुनो, आज का एम एल एल राम अवतार, इंक़िलाब, अंकुश, प्रतिघात आदि फ़िल्में इसी अन्दाज़ की फ़िल्में थीं। मणि कौल और कुमार शाहणी ने ही कलात्मक सिनेमा के महीन परचम की झण्डाबरदारी की लेकिन वह नदी नब्बे आते-आते तक सूख गई। कला के जोखिम से भरी एक अनोखी फ़िल्म कमल स्वरूप की ओम दरबदर भी अस्सी के दशक के नारेबाज़ों का शिकार हुई थी जिसे तब के ‘सचेत’ बुद्धिजीवियों ने इसलिए नकार दिया क्योंकि उसमें सामाजिक सच्चाईयों का कोई प्रगतिशील संदेश उन्हे नहीं मिल सका; आज कला के भूखे लोग खोज-खोज के वो फ़िल्म देखने के लिए मचलते हैं।

नब्बे और नई सदी के वर्षों में प्रयोग तो कई हुए पर कामयाब कम हुए। लगभग टीवी के जन्म और नई आर्थिक नीति के समान्तर ही समान्तर सिनेमा की मृत्यु हो गई। मल्टीप्लेक्स फ़िल्मों का उदय हुआ, फ़िल्मों में बड़े तकनीकि विकास हुए मगर कलात्मक विकास पिछड़ता रहा। खरगोश इन अकाल वर्षों में वर्षा की पहली फुहार की तरह हैं, उस ज़मीन पर जहाँ सिनेमाई प्रयोग के नाम पर लोग शुद्ध नक़ल, योरोपीय सिनेमा और अमरीकी इन्डेपेन्डेन्ट सिनेमा को हिन्दी की बोतल में ढाल कर पेश करने के आगे जाने से क़तराते रहे हों। खरगोश पर सिनेमा की ईरानी परम्परा का प्रभाव ज़रूर दिखता है पर किसी फ़िल्म का नहीं ज़रा नहीं।

फ़िल्म को विदिशा और महेश्वर की पुरानी क़स्बाई दुनिया में फ़िल्मांकित किया गया है। उसका भूगोल बच्चे की मानसिक दुनिया का भूगोल बनता है दरअसल। विवेक शाह का कैमरा और मनोज सिक्का का ध्वनि संयोजन दोनों फ़िल्म की अंतरंगता के माध्यम हैं। जैसा कि पुरस्कारों की झड़ी से ही ज़ाहिर है कि ओसियान में लोगों ने इसे हाथों-हाथ लिया। मेरी उम्मीद है कि यह सफलता परेश भाई को आगे तमाम ऐसी और फ़िल्में बनाने के रास्ते साफ़ करेगी और उनके दर्शक इस फ़िल्म की कला से अभिभूत होकर इस परम्परा को आगे बढ़ाएंगे। विशेषकर इस तथ्य की रौशनी में कि आजकल सामाजिक संदेश को प्रसारित करने का बीड़ा मनोरंजन टीवी ने अपने हाथ ले लिया है, और सिनेमा की ज़मीन का संकट गहरा गया है.. या शायद ये बेहतर हुआ है!

3.11.09

राज्य की नैतिकता और तमाम उलझे सवाल

माओवादियों की नीति और हिंसा के खिलाफ़ लिखे मेरे पिछले लेख को कुछ पाठकों ने उसे आदिवासियों के अधिकारों के खिलाफ़ भी समझ लिया। और यह भी समझ लिया कि मैं राज्य की हर उलटी-सीधी हिंसा और अन्याय का समर्थक हूँ। शायद लेख के शीर्षक से ऐसा बोध हुआ है। ऐसा नहीं है, मैं राज्य की हिंसा का समर्थक नहीं हूँ और मैं पूरी तरह से चाहता हूँ कि आदिवासियों के साथ न्याय हो।

यह राज्य और लोकतंत्र दोनों ही विभिन्न प्रकार रोगों, दोषों से आक्रान्त है लेकिन मैं शरीर में बुखार या दूसरा कोई रोग हो जाने पर हाथ-पैर फेंक कर उससे लड़ने या हताश हो कर ये सोचने कि ‘अब तो मर ही जायेंगे’ की जगह रोग को समझ लेने और उपलब्ध ज्ञान और पिछले अनुभवों के आधार पर उपचार में क्या-क्या कष्ट आने वाला है, उसे जान लेना अधिक बेहतर समझता हूँ। मुझे लगता है कि इस मामले में बहुत सारे लोग राज्य और सरकार के खिलाफ़ एक प्रकार के हताश आक्रोश से भरकर विरोध कर रहे हैं। जैसे कि देखा कि मित्र आनन्द प्रधान ने चिंता व्यक्त की है कि देश में अघोषित आपातकाल लगने वाला है। अरुंधति मानती हैं कि इस देश में लोकतंत्र ही नहीं है एक ढकोसला है। और भी बहुत सारे बुद्धिजीवी चिंतक ऐसी ही चिंताए व्यक्त कर रहे हैं।

लोकतंत्र क्या है? रूसो, वालतेयर के नवजागरण के विचारों और फ़्रांसीसी क्रांति के गर्भ से जन्मा यह शासनतंत्र बंधुता, समानता और स्वतंत्रता के आदर्शों पर आधारित हुआ। लेकिन जन्म लेते ही खुद फ़्रांस में इसका अस्तित्व खतरे में पड़ा रहा और एक समय चक्र के बाद ही इसकी पुनर्स्थापना हो सकी। ब्रिटेन, अमरीका और अन्य योरोपीय देशों में यह फिर भी एक कुदरती चाल से क़ाबिज़ हुआ, भारत में लोकतंत्र लगभग ऊपर से आरूढ़ हुआ। जनता लोकतंत्र के लिए नहीं अंग्रेज़ो को बाहर करने के लिए आन्दोलन कर रही थी। अंग्रेज़ बाहर गए उनका बनाया तंत्र रह गया।

इस तंत्र की ज़रूरत, पहुँच और क्षमता कहाँ तक थी और कितनी थी, यह सब कहना मुश्किल है। माओवादी तो मानते हैं कि हम अभी भी अर्धसामन्ती समाज में हैं (फिर भी लड़ाई पूँजीवाद और साम्राज्यवाद से?)। लेकिन हमारे लगभग सभी बुद्धिजीवी संवाद के समय एक ऐसी जगह से अपनी बात शुरु करते हैं जहाँ पर लोकतंत्र एक ऐसा खूबसूरत और कल्याणकारी लिबास है जो सरकार ठीक से पहन नहीं पा रही और जगह-जगह से उघड़ जा रही है। गोरख पाण्डेय के गीत की एक पंक्ति है : समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई। गीत व्यंग्य में है पर मैं मानता हूँ कि क्रांतिकारी समाजवाद की गति हम देख चुके हैं, जल्दी में बहुत नुक़्सान भी हुए। और अभी तो ये लगता है कि लोकतंत्र बबुआ धीरे-धीरे आई।

राज्य का स्वरूप आज जैसा है, हमेशा वैसा नहीं था। मेरे मित्र आशुतोष आज के इस राज्य को अन्याय की मशीनरी मानते हैं, है, पर मेरा आग्रह है कि वर्तमान की आलोचना करते हुए आदर्शों और सुनहरे सपनों को तो नज़र में ज़रूर रखें पर उसका इतिहास भी मत भूल जाइये। ऐतिहासिक रूप से हम जिसे भारत का स्वर्ण काल समझते हैं –मुग़ल काल – उस दौर में व्यक्ति को सम्पत्ति का अधिकार नहीं होता था, सबै भूमि गोपाल की नहीं, बादशाह की होती थी। जब जिस को चाहे दी जब चाही वापस ले ली। आज रहीम खानखाना बड़े अच्छे हैं कल मन उखड़ गया सब कुछ छीन-छान कर भिखारी बना दिया। कल तक जो दसहज़ारी सरदार था, जंग में काम आ गया या बादशाह रूठ गए, दी हुई जागीर वापस ले ली, यहाँ तक कि मकान और सौगातें भीं। दसहज़ारी सरदार का सारा खानदान दाने-दाने को मोहताज़ हो गया। यह हाल मनसबदारों का हो सकता था तो आम जन के क्या हुक़ुक़ थे, पूछे जाने की ज़रूरत है क्या?

अंग्रेज़ो के सत्ता में आने के पहले आलम ये था कि पूरा ‘देश’ (उस वक़्त देश क्या था, ठीक-ठीक कहना मुश्किल था, लोग दूसरे गाँव जाकर भी परदेसी हो जाते थे) घोड़ों की टापों के नीचे लगातार रौंदा जा रहा था। बरसात के चार महीने जब नदियां उफ़न कर सेनाओं की आवाजाही पर रोक लगा देतीं, साल भर मराठे, ईरानी, तूरानी, अफ़्गान, जाट, रोहिल्ले, और सिक्ख आपस में तलवार भांजते रहते। इसी सब के बीच पिंडारी भी थे जो राजस्थान में टौंक से निकलते और कर्णाटक के दक्षिणी इलाक़ो तक गाँव-गाँव को लूटते और आग लगाते जाते। कई बार ऐसा होता कि एक गाँव साल में तीन-चार बार अग्नि को समर्पित हो जाता। ऐसी हालत से बचने के लिए कुछ गाँवो ने शहरपनाह की तर्ज पर गाँवपनाह की चहारदीवारियां बना रखी थीं ताकि लुटेरों और चौथ लेने आने वाली फ़ौजों से कुछ सुरक्षा मिले। पर चौथ के भूखे लड़ाके गाँव वासियों के खिलाफ़ तोप का भी इस्तेमाल करने से नहीं चूकते।

आज हमारी ज़बान अंग्रेज़ो को गाली देती नहीं थकती लेकिन सच तो यह है कि उनहोने इस भूमिखण्ड को एक भयंकर अराजकता से मुक्ति दिलाई। अराजकता का आतंक कैसा होता था इसे बनारसी दास ने अपनी किताब अर्धकथानक में लिखा है कि जब उनके गाँव में पता चला कि अकबर की मौत हो गई तो लोग-बाग़ के दिल संदेह और भय से दहल उठे। लोगों ने अपने कीमती वस्त्र और गहने ज़मीन में गाड़ दिये। और बहुत से लोग अपनी-अपनी सम्पत्ति को लेके इधर-उधर भागने लगे। हर आदमी घर की रक्षा के लिए हथियार एकत्र करने लगा। ऐसी अराजकता का आलम अकबर महान के मरने पर था। अठारहवीं सदी का जो हाल जो हुआ वो हमारे लिए अकल्पनीय है।

शाह आलम की सत्ता दिल्ली से पालम तक सिमट कर रह गई थी। मगर उसके बहुत पहले यानी १७०७ में औरंगज़ेब की मौत के ठीक बाद से ही अस्थिरता घर कर गई थी और पूरी सदी पूरे देश का नक़्शा और मिल्कियत लगातार बदलता रहा। रात को सोते समय कौन राजा था और सुबह जागते समय कौन- कोई ठीक-ठीक नहीं कह सकता था। कितने मुग़ल सलातीन अंधे किए गए, उनकी औरतों को लज्जित किया गया, गिनती मुश्किल है। खुद शाह आलम उनके एक पुराने वफ़ादार के हाथों अंधे हुए। ऐसी हालत में आम जन किस असुरक्षा की मानसिकता में जीते होंगे, ये जानने के लिए कभी मौक़ा लगे तो ‘मीर की आप बीती’ पढ़ लीजियेगा, सूरते हाल साफ़ हो जाएगा।

जिन अंग्रेज़ो के खिलाफ़ हमने १७५७ से लड़ना शुरु किया, १८५७ में महासंग्राम किया, और १९४७ तक लड़ते रहे, वो अंग्रेज़ वास्तव में इतिहास की एक प्रगतिशील शक्ति थे, ये बात हम आज समझ सकते हैं। उस व़क्त वो विदेशी हमारे दुश्मन थे जो हमारे देश को बुरी तरह से अपनी छवि में ढाल रहे थे, हमारी मर्ज़ी, परम्परा और संस्कारों के विरुद्ध। आज हम जो भी लोकतंत्र, जनतंत्र, मानव अधिकार के नाम पर जिन भी चीज़ों का जाप करते हैं, वो हमारी अपनी सोच नहीं है, अंग्रेज़ो के साथ यूरोप से आयातित चिंतन है।

हम आज अमरीका द्वारा इराक़ और अफ़्ग़ानिस्तान में की जा रही सैनिक कार्रवाई के खिलाफ़ बोलते नहीं थकते। हम ऐसे किसी देश का दूसरे देश पर हमला कर देना ग़लत मानते हैं। ग़लत है.. पर किस नैतिकता के आधार पर? हमारी भारतीय परम्परा में इस तरह के आपसी युद्ध को लेकर 'मानवीय' नैतिकता का कोई आग्रह नहीं रहा। (बुद्ध और महावीर की अहिंसक परम्परा को छोड़ दें तो) उलटे लड़ना और रणभूमि में शहीद होना एक योद्धा के लिए उच्च नैतिक मूल्य है। कहा ही गया है कि वीर भोग्या वसुंधरा। और इस भोग की शुरुआत युद्ध जीतते ही लूट-पाट से आरम्भ हो जाती, जिसे विजेता का अधिकार माना जाता। सबसे बड़ा लुटेरा राजा कहलाने का अधिकारी होता था। (आज वीर भोग्या वसुंधरा मानने वालों को हम अपराधी कहते हैं)

इस्लामिक नैतिकता का युद्ध के बारे में क्या नज़रिया है? अब जब मुहम्मद साहब और खुल्फ़ा उल रशीदुन ही खुद युद्ध का परचम उठा कर चले हो और पराजित जातियों के मर्दोज़न को गु़लाम बनाने की रवायत बरक़रार रखी हो तो इस्लामिक नैतिकता में कोई शुबहे की गुंज़ाइश नहीं है। मुहम्मद साहब ने ७०० यहूदियों के गले इसलिए कटवा दिए थे क्योंकि उन्हे शक़ था कि वो उनके साथ ग़द्दारी करने वाले थे।

विष्णु भट्ट गोडशे की एक किताब है- माझा प्रवास। इस किताब में १८५७ की गदर का आँखो देखा वर्णन है। झांसी में अंग्रेज़ो की लूट के समय लेखक वहीं थे; लिखते हैं कि लूट सात दिन चली। पहले दिन अंग्रेज़ सिपाहियों ने लूटा। उनको देख कर भूसे के ढेर में छिप गए लोगों को आग लगा कर जला देते। कुँए में कूदते तो बन्दूक लेकर जगत पर जम जाते-लोग डूबकर मरते या गोली खाकर। खोज-खोज कर लोगों को मार गया- आम जनों को। इस लूट को विजन कहा गया – जनविहीन कर देने की प्रक्रिया। तीन दिन गोरों ने सोना, चांदी, रूपया-पैसा, ज़ेवर आदि लूटा। चौथे दिन काले मन्दराजी लोगों ने बर्तन भांड़े लूटे। अगले दिन हैदराबाद वालों के नाम; उन्होने कपड़े लूटे। उसके बाद रियासती पलटनें आईं, उन्होने अनाज लूटा।

बाबर ने खुद अपनी आत्मकथा में लिखा है कि उसे लोगों को मारकर उनके कटी हुई खोपड़ियों का पहाड़ बनाने का शौक़ था। हर लड़ाई के बाद ऐसा ज़रूर किया जाता; शायद अपने प्रतिद्वन्दियों के दिल में खौफ़ पैदा करने के लिए। अहमद शाह अब्दाली ने भी इस पुरानी परम्परा को अपने भारत अभियान में जारी रखा। हलाकू ने बग़दाद शहर को क़त्लेआम के बाद जला कर राख कर दिया था। दिल्ली कितनी बार उजड़ी है, कोई हिसाब नहीं है।

और हर छोटी-बड़ी लड़ाई के बाद औरतों का क्या हाल होता था, इसके लिए किसी कल्पना शक्ति की ज़रूरत नहीं है। कहते हैं कि आज दुनिया में चंगेज़ खान के सबसे अधिक वंशज है; कैसे, यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है। इस पृष्ठभूमि में अगर आप इराक़ और अफ़्ग़ानिस्तान का युद्ध देंखे तो आप को मानवीय लग सकता है। अबू ग़रीब की यातना जैसी घटना को छोड़ दें तो अमरीकी फ़ौजों ने न तो लूट-पाट की और न ही बेवजह हत्या-बलात्कार। (भाई मेरे, कृपया इसे अमरीकी नीति का अनुमोदन समझ कर चढ़े मत आईयेगा, ज़रा ठण्ड रखकर पढ़िये, बात-बात पर तलवार मत निकालिए हे मानवतावादी!)

मसला यह है कि आम जीवन में ‘मानवीय’ मूल्य और युद्ध में भी मानवता बरतने की जो नीति विकसित हुई है यह शुद्ध योरोपीय चिन्तन है और आधुनिक काल में पैदा हुआ है। कुछ लोग इस कारुणिक विचार की उत्पत्ति इमैन्वल कान्ट के दर्शन से देखते हैं। जो भी हो, जिस नैतिकता के दम पर हम अमरीका को गाली देते हैं, उस का ठीक-ठीक आगा-पीछा भी हमें नहीं मालूम। वो कैसे, किस रस्ते से हम तक पहुँची, और कैसे वह हमारी और हम उसके मालिक बन बैठे, हम नहीं जानते। हम उदार जन जिन मानवीय मूल्यों की बात-बात पर दुहाई देते हैं वो आम जन (राज्य के कर्मचारी, अधिकारी, सिपाही, सैनिक आदि भी) के भीतर कितने आत्मसात हैं, हमें नहीं मालूम।

हम जिस जीवन को जी रहे हैं, जिन सुविधाओं को भोग रहे हैं, क्या उस के लिए ‘हम’ ने संघर्ष किया है? क्या वो ‘हमारी’ आंकाक्षाओं और प्रयत्नों का परिणाम है? भारत में स्त्रियों को मताधिकार मिला, दलितों को आरक्षण मिला है, इसके लिए भारतीय स्त्रियों और दलितों ने कितना संघर्ष किया? क्या क़ुर्बानियां दी? तो फिर बिना संघर्ष, बिना बलिदान के कैसे मिल गयी उनको यह वरीयता? औरतों को मताधिकार योरोप के देशों में लम्बे संघर्ष के बाद मिला (और वो भी मिला क्योंकि स्त्री स्वातंत्र्य पूँजीवाद की ज़रूरत है, उसे सस्ता मज़दूर चाहिये) भारत में यूँ ही मिल गया? कैसे? बिना लड़े ये लड़ाईयां कैसे जीती जा रही हैं? वो कौन सी शक्ति है जो इस बदलाव के पीछे है?

शायद हमें यह मानने की ज़रूरत है कि कुछ अधिकार माँगने से, लड़ने से मिलते हैं, और कुछ बहुत लड़ने पर भी नहीं मिलते क्योंकि उनके लिए ऐतिहासिक परिस्थिति परिपक्व नहीं थी, और कुछ बैठे-बिठाए मिल जाते हैं क्योंकि वो इतिहास की ज़रूरत हैं। सोचिये इन में से कुछ अधिकार हमें अंग्रेज़ो के समय में ही हासिल हो गए थे?

आखिर क्या दबाव थे जिसके तहत अंग्रेज़ो ने मताधिकार और प्रतिनिधित्व जैसे ये अधिकार हमारी तरफ़ बढ़ा दिए थे? लोकप्रिय शासक अकबर के समय ऐसा क्यों नहीं हो सका? योद्धाओं की सन्तान उस अकबर ने तो ज़मीनदार, मनसबदार, जागीरदार और सूबेदार की श्रेणियों में ही सत्ता का वितरण करके मान लिया कि जनता का प्रतिनिधित्व सम्पन्न हो गया, चुनाव और मताधिकार जैसी बात उसके ख्याल में भी नहीं आई, बावजूद उसकी सारी भलमनसाहत के। लेकिन ‘सौदागर’ अंग्रेज़ ने सत्ता के बाज़ार को जन-जन तक फैला दिया और आमजन को अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार दे दिया। इस अधिकार को हमें मिले लगभग अस्सी बरस से भी ऊपर हो गया लेकिन कितनी अजीब बात है कि हम आज भी अपने लिए ज़मीनदार, मनसबदार, जागीरदार और सूबेदार ही चुनते हैं, अपने प्रतिनिधि नहीं। ये दोष राज्य का है कि जनता का?

ये ठीक बात है कि राज्य हमारे जीवन की अधिकतर बातों का नियन्ता है और उसने ही हमें शिकायत करने का भी हक़ हमें नियत कर दिया है। पर हमारी भी आदत हो चुकी है सारी समस्याओं को किसी एक संस्था के मत्थे मढ़ कर छुट्टी पाने की। ये प्रवृत्ति हमारी अपने जीवन की स्वयं ज़िम्मेदारी न लेने और हर बात के लिए ईश्वर पर निर्भर होने की आदत का अवशेष है। ईश्वर से हमारी शिकायतों का सिलसिला थमता नहीं दिखता। हम बजाय पुरुषार्थ पर विश्वास करने के हर चीज़ के लिए ईश्वर के आगे झोली फैलाये खड़े रहते हैं।

(वैसे कुछ चीज़ों का ठीकरा हम अंग्रेज़ों के सर भी फोड़ते हैं जैसे कि साम्प्रदायिकता; अच्छे-खासे प्रगतिशील लोग इस बात पर विश्वास करना पसन्द करते हैं कि अंग्रेज़ो के पहले भारत में साम्प्रदायिक मन-मुटाव नाम की चीज़ थी ही नहीं। एक मिसाल के तौर पर अशफ़ाक़ुल्ला खाँ के बारे में खुद बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि उनके साथ आने से सिद्ध हो गया कि मुसलमान ग़द्दार नहीं होते- क्या ऐसी बातें सौ-पचास बरस के अंग्रेज़ों के षडयन्त्र से किसी के मन में बैठ सकती हैं या उसके लिए आपसी नफ़रत का एक लम्बी विरासत होनी चाहिये?)

इस प्रवृत्ति की सबसे अच्छा उदाहरण शिरडी के साईं बाबा के भक्त हैं: साईं बाबा का दो शब्दों का संदेश है- श्रद्धा और सबुरी; उनके भक्तों में न तो श्रद्धा है और न सबुरी, शिरडी जा के माँग-माँग कर उन्हे मरने के बाद भी हकालते रहते हैं। ऐसे अनास्था वाले लोग – हम सभी, भले ही हम साईं बाबा के भक्त हो या न हों, इस दोष के रोगी हैं – राज्य के प्रति भी ऐसी ही अनास्था से पेश आते हैं। ये नहीं है, वो नहीं है, ये नहीं दिया, वो नहीं दिया। कोई विपदा आती है तो टीवी का कैमरा आते ही लोग शुरु हो जाते हैं, हमें तो कोई पूछने नहीं आया, किसी ने हमारी खबर नहीं ली? सवाल यह भी पूछना चाहिये लोगों ने एक-दूसरे की कितनी मदद की?

वेलफ़ेयर स्टेट (पहले थे, अब पता नहीं हैं कि नहीं) का तो काम है लोगों की मदद करना लेकिन इस स्थिति को अठाहरवीं सदी से तुलना कर लें और समझें। सरकार/राज्य किसी ईश्वर का स्थानापन्न है – ईश्वर के प्रति तो हम उच्छवास भरते हुए कहते हैं कि हे ईश्वर कहाँ हो तुम - लेकिन सरकार को सीधे गरियाते हैं। क्योंकि वो हमारी प्रतिनिधि है, उसे हमारे हित में काम करना चाहिये, लेकिन वो करती नहीं, क्योंकि हमारे प्रतिनिधि हमारे नहीं किसी पूँजीपति के प्रतिनिधि हैं। एक बार फिर से- क्या इस का दोष राज्य का है कि जनता का?

अपनी इस अनास्था के चलते हमारे भीतर की उद्यमता पर भी असर पड़ा है, वो भी गहरे तौर पर भ्रष्ट हो चली है। किसी भी काम को हम पूरी शिद्द्त और मनोयोग से कर ही नहीं पाते। थोड़ी सी सुख-सुविधा और ऐशो आराम हमारी नैतिकता और आदर्श को ढहा देने के लिए काफ़ी साबित होते हैं। मुस्लिम हितों की बात करने वाले क्रांतिकारी अपने राजनैतिक करियर के लिए उन्ही के शक़-शुबहों के सहारे उनका शोषण करने लगते हैं। मज़दूरों के महान नेता, कोकाकोला को देशनिकाला देने वाले जार्ज साहब किस गली में जा कर फ़ंसते हैं। अपने भीतर की अनुभूतियों की अभिव्यक्ति करने निकले कविवर पुरुस्कारों की जुगाड़ू राजनीति में दण्ड पेलने लगते हैं। बाक़ी छोड़िये देखिये उदाहरण शिबू सोरेन और मधु कोडा का, आदिवासियों के बीच से निकले उनकी आकांक्षाओं को स्वर देने के लिए लेकिन कहाँ जा गिरे? क्या इन के पतन पीछे सरकार और राज्य का चरित्र ही उत्तरदायी है?

राज्य से पहले हम एक समाज हैं और समाज से पहले हम एक व्यक्ति। व्यक्ति के रूप में हम कितने नैतिक हैं? ये कौन सी बात है कि गूँहू रोटी को गाली दे कि वो बेस्वाद है? ये बात ठीक है कि राज्य का जो स्वरूप हमें मिला है उसे वैसा बनाने में हमने कोई भूमिका नहीं निभाई है, मगर सरकार तो हमारी ही अभिव्यक्ति है न? और अगर हम राज्य के इस स्वरूप से असंतुष्ट हैं तो हमारे पास कोई विकल्प तो होना चाहिये?

माओवादियों के विकल्प की चर्चा मैं पिछले लेख में कर चुका हूँ, वो मेरी समझ से वरेण्य नहीं है। अरुंधति से जब पूछा गया तो उन्होने कहा कि उनके पास कोई मैनिफ़ेस्टो नहीं है। यही हाल देश के सभी (ग़ैर-मार्क्सवादी) असंतुष्ट बुद्धिजीवियों का है: उनके पास शिकायतें तो हैं, सवाल तो हैं पर विकल्प नहीं है। अरुंधति का जो लम्बा लेख आउटलुक में छ्पा है उसकी मुख्य बातें निम्न हैं :

१) आदिवासी जंगल- पहाड़-नदी के साथ एकाकार हैं (जैसे आदिकाल में सभी मनुष्य थे)
२) बहुराष्ट्रीय कम्पनियां आदिवासियों की इस सम्पदा पर नज़र गड़ा के बैठी हैं और उसे हथियाने के लिए कार्यरत हैं।
३) यह सम्पदा एक अनुमान के अनुसार चार ट्रिलियन (१२ शून्य) डालर्स की है, भारत के जीडीपी से कई गुना अधिक।
४) देश की सरकार ने ऐसी बहुराष्टीय कम्पनियों के साथ समझ के समझौते कर रखे हैं जिसके तहत ७-८% के हिस्सेदारी पर भारत सरकार यह सम्पदा उनके हवाले कर देगी।
५) इस मुनाफ़े में आदिवासियों को कोई हिस्सा नहीं मिलेगा, जो उसके असली मालिक हैं।
६) उलटे उन्हे अपने घर, गाँव, और वातावरण –जिसके साथ वो एकीकृत हैं –से बेदखल कर दिया जाएगा।
७) माओवादियों ने आदिवासियों के असंतोष को स्वर दिया है, पर वो बरगलाए हुए नहीं है, उनकी अपनी एक लड़ाकू परम्परा है।
८) माओवादियों के साथ उनकी इस हथियारबन्दी से बहुराष्ट्रीय कम्पनियां खनन का अपना काम नहीं कर पा रहीं।
९) सरकार पर इन समझौतों को निभाने के लिए दबाव बढ़ रहा है औरे जिसके कारण वो इस समस्या को बढ़ा-चढ़ा कर पेश कर रही है।
१०) वही सरकार जो विकास के नाम पर विस्थापित पाँच करोड़ लोगों का पुनर्वास नहीं कर सकी, उसे ३०० सेज़ बनाने के लिए १,४०००० हेक्टेयर ज़मीन मिल जाती है।
११) सरकार के साथ-साथ (चिदम्बरम वेदान्ता के लिए वक़ील और डाइरेक्टर के पद भी सम्हाल चुके हैं) अदालतें भी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हाथों बिक चुकी हैं।
१२) और जनमत को अपने पक्ष में करने के लिए माओवादियों के दम-खम और आतंक का हौवा बना रही है ताकि उनके बहाने आदिवासियों को रौंदा जा सके और साथ ही दूसरी लोकतांत्रिक आवाज़ों को भी।
१३) सरकार उनसे बात तक करने को तैयार नहीं वह युद्ध चाहती है बस।
१४) पूँजी के हाथ की कठपुतली मीडिया सरकार का प्रवक्ता बना हुआ है, और कोई स्वतंत्र रपट करने के बजाय सरकार की भाषा बोल रहा है।

मोटे तौर पर इनमें से शायद ही कोई ऐसी बात हो कि जिसका कोई संवेदनशील व्यक्ति विरोध करेगा। बंधुता, समानता और स्वतंत्रता के मूल्य हम सभी ने भीतर तक स्वीकार कर लिए हैं (ये सवाल भी उठता है कैसे अपना लिए हैं, बिना उन पर विचार किए, क्योंकि वो खुद व्यवस्था द्वारा प्रचारित हैं; और सच में कितने अपनाए हैं, कहीं ऐसा तो नहीं कि व्यापक जन भीतर अभी भी किसी अन्य नैतिक मापदण्ड के सहारे हैं) और ये जो हो रहा है इन आदर्शों से मेल नहीं खाता। ज़ाहिर तौर पर अत्याचार हो रहा है। मैं इस अत्याचार का विरोध करता हूँ और चाहता हूँ कि पर्यावरण की हानि न हो, जंगल-पहाड़-नदी की पवित्रता बनी रही, पर मेरे चाहने और विरोध करने भर से क्या होता है। इतिहास बड़ा क्रूर है उसकी विशाल नदी के बीच मेरी नन्ही वैचारिक (और तमाम दूसरों की ठोस आन्दोलित) चेष्टाएं क्या बिसात रखती हैं।

इस नदी की धारा को पलटने के लिए जिस प्रकार की हिंसा और नरबलि लगेगी उस के प्रति हम अहिंसक उदारजनों का क्या नज़रिया होगा, यह भी सोचना चाहिये। माओवादी तथा दूसरे पके हुए राजनीतिकर्मियों को कोई शुबहा नहीं होता, वो अपनी तरह की व्यवस्था लाने के लिए हर क़ुरबानी देने के लिए तैयार रहते हैं।

स्वयं अरुंधति भी जानती हैं कि माओवादी, आदिवासियों की बलि देकर आम जनता के आगे नरसंहार का एक विहंगम दृश्य खड़ा कर के अपने आंदोलन को आगे बढ़ाने की नीति खेल सकते हैं। लेकिन फिर भी वो उनके समर्थन में इसलिए जाती हैं क्योंकि उन्हे इस कॉरपोरेट पूँजीवाद के अधिक समाजवादी तंत्र पर भरोसा है (फिर भी ये सवाल रह जाता है कि उसमें पर्यावरण के मसलों की जगह कहाँ रहेगी?), इसीलिए अरुंधति जिस मुखर स्वर से राज्य की हिंसा की आलोचना करती हैं माओवादी हिंसा की नहीं करतीं। यानी विरोध हिंसा का नहीं, हिंसा के चरित्र का है।

आप तय कीजिये कि आप किस हिंसा के हिमायती हैं। हिंसा से छुटकारा नहीं है। बुद्ध की शिक्षाएं पा कर भी जापानी हिंसा के पुजारी बनी रहे। गाँधी बाबा अहिंसा-अहिंसा करते रहे, देश उन्हे बापू, महात्मा कहता रहा और जब देश आज़ादी की बारी आई तो लाखों लोग अल्लाहोअकबर और हरहरमहादेव कह कर लड़ मरे। हिंसा की ऐसी सर्वव्यापकता के बावजूद हम हिंसा को अनैतिक मान कर अपना पक्ष चुनते हैं, मैं भी – ऐसा है अपने युग की नैतिकता का दबाव।

मेरी इच्छा है कि सरकार और माओवादी के नेतृत्व में आदिवासी जन बातचीत करें और सरकार उनकी ज़मीन का उन्हे उचित मुआवज़ा दे, और साथ ही यह भे सुनिश्चित करे कि पर्यावरण की हानि न हो या कम से कम हो। ऐसा चाहने वाले किसी भी नागरिक आन्दोलन का मैं समर्थन करता हूँ। साफ़ तौर पर मैं नहीं चाहता कि मार-काट हो, मैं नहीं चाहता कि माओवादी प्रबल होकर इस राज्यतंत्र को कमज़ोर करें और १८ वीं सदी वाली अराजकता का परिदृश्य दोहराया जाय। पर ये सब सदिच्छाएं हैं, देखें ऐसा सम्भव हो पाता है कि नहीं।

31.10.09

एक निर्मम राज्य के पक्ष में

बावजूद इसके कि लोकतांत्रिक राज्य अभी भी, मानवाधिकारों को अनदेखा कर के अपनी प्रजा का दमन करता है, और एक विशेष वर्ग के हित में समाज के दूसरे वर्गों के शोषण को प्रायोजित करता है, ऐतिहासिक तौर पर अब तक लोकतांत्रिक राज्य ही सबसे उदार और मानवतावादी सिद्ध हुआ है- और वो व्यवस्थाएं जो अपने को मनुष्य के विकास की आगे की अवस्थाएं मानती थीं, कहीं अधिक क्रूर और दमनकारी सिद्ध हुईं जैसे समाजवाद और साम्यवाद।

देश में चल रहे आन्दोलनों, विशेषकर कश्मीर के हुर्रियत आन्दोलन और आदिवासियों के बीच जंगल के अधिकार को लेकर माओवादियों द्वारा चलाए जा रहे आन्दोलन, के सन्दर्भ में हमें ये समझने की ज़रूरत है कि राज्य कोई व्यक्ति नहीं है कि जिसकी पकड़ संवेदना के नदी के प्रवाह में बह कर अचानक ढीली पड़ जाएगी और वो कश्मीरियों को उनकी आज़ादी ले लेने देगा और आदिवासियों को उनके जंगल। राज्य हज़ारों साल के मनुष्य के इतिहास में विकसित एक जटिल सरंचना है जो अपने अस्तित्व को विलीन नहीं होने दे सकती न अपनी विघटन को सहन कर सकती है। ऐसे ही नहीं टूट गई बर्लिन वाल; उसके टूटने की पूर्वशर्त थी एक राज्य का विघटन, जैसा कि हुआ। और ये बात बेहद बचकानी है कि कोई किसी राज्य से यह उम्मीद करे कि वो अपने क़ब्ज़े की ज़मीन छोड़ दे?

ये एक अजीब विरोधाभास है : हमारे भारत के उदारवादी भद्रजन सबसे प्रगतिशील लोग, सबसे पिछड़े जन के साथ मोर्चाबद्ध हैं। मात्र विरोध दर्ज करने के लिए? या वे सच में विश्वास करते हैं कि भविष्य का समाज यही लोग गढ़ेंगे? मैं समझ नहीं पाता कि कश्मीर में कट्टर जमाते इस्लामी के नेता सैयद अली शाह गिलानी जैसे शख्स के हाथ में यदि सत्ता आएगी तो वह किस तरह के लोकतंत्र का निर्माण करेगा? चलिए उन्हे छोड़ दें और मान लीजिये कि हुर्रियत के दूसरे धड़े मीरवाइज़ (यानी इस्लाम के उपदेशक) उमर फ़ारुख ही अगर अगुआ हुए तो?

मीर वाइज़ पेशे से एक मौलवी हैं एक ऐतिहासिक मस्जिद के मुल्ला - कुछ ऐसे समझें कि जैसे कि अपने जामा मस्जिद के शाही इमाम बुखारी साहब। जो लोग भूल गए हों वे कृपया याद कर लें कि शाही इमाम साहब ने हमारी अपनी उदार मानवतावादी नायिका शबाना आज़मी के बारे में क्या उद्गार प्रगट किए थे एन डी टी वी के एक कार्यक्रम पर। हो सकता है कि व्यक्तिगत रूप से मीरवाइज़ बेहद उदार और भले हों पर जिस विचारधारा के वे प्रवक्ता हैं वो बेहद दमनकारी है।

मेरा मानना है कि कहीं न कहीं औद्योगिक विकास एक ऐसी छंछूदर बन चुका है जिसे अब सिर्फ़ निगला जा सकता है, उगला नहीं। साम्राज्यवादी शक्तियों और उनके ऐतिहासिक अन्याय से लड़ने की एक अन्य मिसाल ज़िम्बाब्वे में राबर्ट मुगाबे भी हैं –जिन्होने सौ-डेढ़ सौ साल पहले गोरों द्वारा की हुई ज़मीन की लूट का इंसाफ़ तो कर दिया मगर देश, समाज और अर्थव्यवस्था का कबाड़ा कर दिया। ज़िम्बाब्वे अब शायद एक महामारी बन चुका है।

स्वयं अपने गांधी जी भी एक रामराज्य का सपना देखते थे। उनका मानना था इस समाज की सबसे बड़ी बुराइयों में वक़ील और डॉक्टर हैं। वक़ीलों और डॉक्टरों दोनों के व्यवहार से मैं भी बहुत क्षुब्ध रहता हूँ, मगर गांधी जी के रामराज्य में दलितों की जगह को लेकर अम्बेडकर को क्या आपत्ति थी इसे नज़र अन्दाज़ नहीं किया जा सकता। उनके ग्रामीण समाज में जातीय रिश्ते सिर्फ़ सवर्णों की सहृदयता के बंधुआ होते। क्या वो हमें, उदार मानवतावादियों को स्वीकार्य है?

अगर मुझ से पूछा जाय कि मुझ किन आदर्शों में विश्वास है तो शायद मैं एक अराजकतावादी सिद्ध हो जाऊँ। जहाँ न राज्य है, न पुलिस, न क़ानून, आदमी प्रकृति के साथ एकाकार है और ‘जीवनयापन के लिए काम करना’ मानवता का अपमान है। पर क्या मैं आज के समाज में इन आदर्शों के साथ जी सकता हूँ? यदि मैं भारत सरकार से माँग करूँ कि पुलिस और क़ानून का अन्त कीजिये और उसके बाद खुद भी विलोप हो जाइये और जेन्टलमैनली मनमोहन सिंह मेरी माँग मान कर सब कुछ समाप्त कर के अपने आसाम वाले घर में पलायित कर जाएं तो क्या मेरे आदर्शों का अराजक समाज क़ायम हो जाएगा? या पलक़ झपकते ही हरियाणवी गुण्डे/ बिहारी बाहुबली/इस्लामी आतंकवादी/हिन्दू हलकट अपने-अपने शक्ति-वृत्त बना लेंगे और समाज में व्यवहारिक अराजकता क़ायम हो जाएगी। दार्शनिक अराजकता और व्यवहारिक अराजकता में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ है।

मुझे खेद है कि इस देश में आत्महत्या कर रहे ग़रीब किसानों और अपने ही ज़मीन से बेदखल किए जा रहे आदिवासियों, और क़ानून ताक़ पर रखकर सताए जा रहे नक्सलियों के प्रति अपनी सारी चिन्ताओं के बावजूद मैं माओवादियों की हिंसा का समर्थन नहीं कर सकता। क्योंकि मुझे पूरा भरोसा है कि एक बार माओवादी लड़ाकू मानवता से द्रवित होकर अपने दुश्मन (आम सिपाही) को गोली मारने से हिचकिचा सकता है, लेकिन राज्य तंत्र की नमक-रोटी खाने वाला सिपाही ये रियायत माओवादी को नहीं बख्शेगा। मैं शायद उमर बढ़ने के साथ कुछ अधिक निराशावादी (या व्यवहारिक) हो गया हूँ और अपने उस क्रांतिकारी जोश को पूरी तरह हिरा चुका हूँ जो कि जवानी के दिनों में मुझे क्रोध और आक्रोश से भर दिया करता था- अब मुझे यक़ीन है कि माओवादियों और राज्य की इस लड़ाई में मारे आदिवासी ही जाएंगे या फिर निरीह सिपाही।

मैं नहीं जानता कि कारपोरेट पूँजीवाद और उसकी सहयोगी शक्तियों ने मिलकर ये जो भूमण्डलीकरण की महा संरचना/ महातंत्र खड़ा किया है, उसका विकल्प क्या हो सकता है? पर ये ज़रूर लगता है कि जो शक्तियाँ अभी अमरीकी नेतृत्व में इस पूँजीवादी लोकतंत्र का विरोध कर रहे हैं – इस्लामिक जड़वादी और माओवादी – वो इसका विकल्प नहीं हो सकते। ये दोनों प्रतिगामी शक्तियाँ हैं जो एक पुरातनता को बचाने की कोशिश की लड़ाई लड़ रहे हैं। इस्लाम लड़ रहा है एक मध्ययुगीन नैतिकता को बचाने के लिए- उसका विकल्प है शरई क़ानून।

और माओवादी लड़ रहे हैं आदिवासियों के जंगल पर अधिकार के लिए, कम से कम नज़र तो ऐसा ही आता है और दावा भी वो ऐसा ही करते हैं, पर उनके इरादे कुछ और हैं। वे नव-लोकतंत्र के लिए लड़ रहे हैं- माओ की एक अवधारणा न्यू डेमोक्रेसी के लिए – जो पूंजीवाद को सामन्तवाद और साम्राज्यवाद के चंगुल से आज़ाद करेगी। यह सोच माओ ने १९४० में चीन की हालात के अनुसार पेश की थी। वे पूँजीवाद (यानी उद्योग, कारखाने, खनन, बाज़ार; सब मिला कर जंगल के आदिम जीवन से पूर्ण विरोध) के विरोधी नहीं है मगर उनका मानना है कि अभी का शासक वर्ग पूँजीवाद का सही विकास करने में अक्षम है। यदि वे सत्ता में आए तो चीन की तरह खुद ही पूँजी का विकास करेंगे- चीन के मानवाधिकार हनन से कैसे बचेंगे, ये वे नहीं बताते।

पहले तो इस तरह की सोच एक नियतिवादी चिन्तन है: विकास की सारी अवस्थाएं और नमूने पहले से तय हैं अब मनुष्य को अंजाम देना है- मगर मनुष्य (उनकी समझ से) ऐसा मूढ़ है कि विकास की नमूने से भटक कर एक अलग ही रास्ता पकड़ लेता है; अपने नियन्ता के सच्चे अनुगामी होने के नाते माओवादी ये ज़िम्मेदारी अपने सर लेते हैं कि नमूने की योजना को जस का तस लागू किया जाय।

दूसरे ये कि नियन्ता माओ के द्वारा पूज्य एक पूर्वगामी नियन्ता लेनिन ने इस विषय में एक विरोधी बात कह रखी है – “कोई मार्क्सवादी यह कभी नहीं भूल सकता कि पूँजीवाद, सामन्तवाद की तुलना में प्रगतिशील है, और साम्राज्यवाद इजारेदारी के पहले की पूँजीवादी अवस्था से प्रगतिशील है। इसलिए हमें साम्राज्यवाद के खिलाफ़ हर संघर्ष का समर्थन नहीं करना चाहिये। साम्राज्यवाद के विरुद्ध प्रतिक्रियावादी शक्तियों के संघर्ष का समर्थन हम नहीं कर सकते”।

लेनिन की समझ से माओवादी प्रतिक्रियावादी साबित होते हैं। (विकास के साथ उनके विरोधाभास पर यहाँ और पढ़ें) और क्रांतिकारी भी तभी तक क्रांतिकारी रहता है जब तक सत्ता की लड़ाई जारी है, सत्ता पलटते ही वह खुद प्रतिक्रियावादी हो जाने के लिए अभिशप्त है। नेहरू जी आज़ादी मिलने के पहले तक तो नौकरशाहों की सख्त खिलाफ़त किया करते थे, मगर सत्ता हाथ में आते ही उन्होने नौकरशाहों में ही अपना सबसे बड़ा मित्र पाया। और जो क्रांतिकारी प्रतिक्रियावादी नहीं होते वे कितने बड़े मानवतावादी होते हैं इसे स्टालिन के दौर में मारे गए और माओ की सतत क्रांति के प्रयोग सांस्कृतिक क्रांति के दौरान मारे गए लाखों लोगों की मिसाल से समझना चाहिये।

निछन्दम जंगल का प्राकृतिक जीवन और शरई क़ानून की सीमाओं में रहकर एक पवित्र नैतिक जीवन दोनों ही काल्पनिक अवधारणाएं हैं और रूमानी दोष से ग्रस्त हैं। औद्योगिकीकरण और उसकी संस्कृति का पहाड़ एक ऐसा वस्तुगत सच है जिसे अनदेखा करना, शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सर दबाना है। भविष्य का समाज इस पहाड़ के उस पार ही बन सकता है, इस पार नहीं।

औद्योगिक समाज ने हम से बहुत कुछ छीना है मगर जो हमें दिया है उसकी चर्चा करना हमारे क्रांतिकारी मित्र हमेशा भूल जाते हैं? भौतिकवाद मानता है कि मनुष्य का वस्तुजगत से एक गहरा तादात्म्य है, और वस्तुओं से भी। आज जिन-जिन वस्तुओं को हम अपने इर्द-गिर्द पाते हैं जिसने हमारा जीवन सुविधाजनक बनाया है, उन्हे हम तक लाने में पूँजीवादी बाज़ार ने जो क्रांतिकारी भूमिका निभाई है, उसे लगातार अनदेखा किया नहीं जा सकता। स्त्री अधिकार को एक मानसिक अवधारणा के जगत से निकालकर उसकी बराबरी के लिए एक वास्तविक दुनिया बनाने का काम पूँजीवाद ने ही किया है। ज्ञान को कुलीन कुटियाओं से निकालकर जनसाधारण तक पुस्तकाकार में पहुँचाने का काम क्या बाज़ार ने नहीं किया है? इन्टनेट जैसे सूचना के महामार्ग और लैपटॉप जैसे उपकरण को जनसुलभ करने का काम बाज़ार के बिना कैसे मुमकिन हो सकता था?

समस्या दुनिया भर में चल रहे बाज़ारीकरण के साथ आ रहे बदलाव से होने वाले संक्रमण की है। जैसे भारत की सरकार कृषि में आधुनिकीकरण तो चाहती है मगर ज़मीन पर हल जोत रहे किसान को आत्महत्या के पहाड़ी से नीचे धकेल कर। सरकारी तंत्र द्वारा अपने लोगों की प्रति इस संवेदनहीनता का विरोध करते हुए क्या हम उन सब के पक्ष में भी खड़े हो जाएंगे जो विरोध में हमारे साथ हैं? चूंकि वो बन्दूक लेकर अत्याचार के विरोध की लड़ाई लड़ रहे हैं क्या सिर्फ़ इसलिए उनके सपने के दुनिया खुदबखुद इस दुनिया से बेहतर हो जानी है?

उम्मीद बस यही की जा सकती है कि उनके इस आन्दोलन से आदिवासियों और नक्सली कार्यकर्ताओं के प्रति बरती जा रही निर्ममता में कमी आए और उनके साथ न्याय हो!

25.10.09

रचयिता की मृत्यु

इलाहाबाद के ब्लॉग सम्मेलन में मुझे भी बुलावा था, जाना तय भी था मगर आरक्षण नहीं मिला और ऐन मौक़े पर तबियत ने भी जवाब दे दिया। प्रकृति और संयोग दोनों के नकार को स्वीकार कर हम घर पर ही रुके रहे। अनूप जी और होनहार विनीत की रपटें और मसिजीवी की फ़िसलरपटें पढ़ता रहा- बहसें तमाम जो हुई उनसे विभक्ति से अधिक दुख दोस्तों से मिल न पाने का था। घर पर पड़े-पड़े जी बहलाने के लिए बोर्ग़्हेज़ पढ़ रहा था। उसमें कैल्विनवाद का ज़िक़्र आया। कैल्विनवाद को समझने के लिए पीटर वाटसन की आईडियाज़ पलटने लगा। उसे पलटते हुए देरिदा को बूझने लगा।

उसी सन्दर्भ में रोलाँ बात्थ भी याद आए और याद आई उनकी किताब माइथॉलजीस। एक और लेख का ज़िक्र देखा- डेथ ऑफ़ दि ऑथर। नेट पर खोजा तो मिल गया। पढ़ कर बाग़-बाग़ हो गया। नामवर जी ने इलाहाबाद के सम्मेलन में जो कहा वो मेरी उनसे जो उम्मीद थी उस से काफ़ी कम था। मेरा अनुमान था कि वो ब्लॉग माध्यम के अनोखेपन की दार्शनिक विवेचना करेंगे। निराशा हुई। फिर याद आया कि प्रमोद भाई कहते हैं हिन्दी में कोई भी बुद्धिजीवी नहीं है। है कोई रेमण्ड विलियम्स, वाल्टर बेन्जामिन या फ़ूको? सही है, कोई नहीं है। अचरज होता है कि इतनी अद्भुत बातें रोलाँ बात्थ १९६७-६८ में कर रहे थे, मेरे जन्म के साल, और हम हिन्दी में आज भी प्रेमचन्द के युग से ठीक से बाहर नहीं आ सके हैं? इस लेख को लिखे जाने के इतने सालों बाद भी हिन्दी में इस चेतना की सुगबुगाहट तक नहीं है? फिर प्रमोद भाई की बात- हिन्दी एक मरी हुई भाषा है। है कि नहीं पता नहीं, कुछ उनके धकेलने पर और कुछ अपनी भाषा के प्रति ज़िम्मेदारी के एहसास से दब कर एक दिन इस अनुवाद के नाम गया।

इस लेख में अनुवाद करते हुए वाक्य रचना में विराम चिह्नों के प्रयोग को ज्यों का त्यों छोड़ा गया है। कई जगह मैं पूर्ण विराम का इस्तेमाल कर सकता था, लेकिन इस चिन्तन को मैं ऐसे रख कर ही देखना चाहता हूँ। वैसे भी हिन्दी और उसकी जननी संस्कृत में भी विराम चिह्नो की परम्परा नहीं है, यह परम्परा सीधे योरोप से आई है। हिन्दी में आज भी पूर्ण विराम, कॉमा, कोष्ठक के अलावा और विराम चिह्न कम ही इस्तेमाल होते हैं। प्रमोद भाई जो मन की गतिविधि को उसके समूचेपन में पकड़ने की कोशिश सतत करते हैं, इन विराम चिह्नों से क़तराते रहते हैं शायद इसलिए कि पहले से जटिल-जटिल अलाप रहे पाठक विराम चिह्नों की जटिल झाड़ियों में न उलझ मरें। फिर भी मेरी इच्छा है कि लोग कोशिश करें और जटिल-पाठ करें।

हिन्दी में इस भाषा की परम्परा नहीं है, इसलिए पाठकों से थोड़े धीरज की उम्मीद है। रोलाँ बात्थ बीसवीं सदी के बड़े दार्शनिक नामों में से हैं, फ़्रांस की धरती से जो उत्तर आधुनिकता के दादाओं में जिनका नाम लिया जाता है उन में फ़ूको, लाकाँ, और देरिदा के साथ बात्थ भी शामिल हैं। इस लेख में बात्थ ने ऑथर और राइटर (स्क्रिप्टर) में भेद किया है जिसे मैंने रचयिता और लेखक (लिपिक) के रूप में अनूदित किया है।

रचयिता की मृत्यु : रोलाँ बात्थ

बालज़ाक अपनी कहानी सरासिने में, औरत के भेस में रहने वाले एक कैस्तरातो (नटुआ जिसे बचपन में ही बधिया किया गया हो) के सन्दर्भ में लिखते हैं: “ये स्वयं एक औरत थी, अपने एकाएक उपजे डर, बेदलील तरंगें, अपने मादरजाद खौफ़, बिलावजह की दिलेरी का मुज़ाहरा, अपने हौसलों और अपने लज़ीज़ नाज़ुक़ी जज़्बात के साथ’’। ये कौन है जो यूं बोल रहा है? क्या ये औरत के भेस में छिपे कैस्तरातो की उपेक्षा से चिंताग्रस्त कहानी का नायक है? या अपने निजी अनुभवों से औरत के दर्शन से समृद्ध बालज़ाक नाम का आदमी है? या फिर रचयिता बालज़ाक, जो स्त्रीत्व के बारे में कुछ साहित्यिक विचारों की व्याख्या कर रहा है? क्या यह सार्वभौमिक ज्ञान है? या रूमानी मनोविज्ञान? यह जानना कभी सम्भव नहीं होगा, क्योंकि सारा लेखन एक विशेष प्रकार की वाणी है जिसमें समाई होती हैं दूसरी कई अनजानी वाणियां। और साहित्य इसी विशेष प्रकार की वाणी का आविष्कार है जिसके उद्गम का हम कोई निर्धारण नहीं कर पाते: साहित्य है वह तटस्थ, मिला-जुला, तिर्यक आयाम जिसमें पलायित हो जाते हैं सभी विषय, वो जाल जिसमें खो जाती हैं सभी पहचान, सर्वप्रथम उस व्यक्ति की पहचान जो उसे लिखता है।

सम्भवतः हमेशा यही मामला रहता है: जब कभी कुछ वर्णन किया जाता है, वास्तविकता पर किसी सीधी प्रतिक्रिया के लिए नहीं वरन अकर्मक लक्ष्य के लिए – यानी किसी भी क्रिया से अन्ततः परे लेकिन प्रतीक के ठीक-ठीक प्रयोग में - तब होता है यह अलगाव, वाणी अपना उद्गम खो देती है, रचयिता प्राप्त होता है अपनी मृत्य को, लेखन आरम्भ होता है। तब पर भी इस परिघटना को लेकर भावना मिली-जुली रही है; प्राचीन समाजों में, वृत्तान्त कभी एक व्यक्ति की ज़िम्मेवारी नहीं रही, बल्कि एक माध्यम की, ओझा की या वक्ता की, जिसके प्रदर्शन (वृत्तान्त संग्रह की उसके कौशल) पर श्रद्धा हो सकती थी परन्तु उसकी मेधा पर नहीं। रचयिता एक आधुनिक आकृति है, जो पैदा हुई है बेशक़ हमारे समाज (पश्चिमी योरोप) द्वारा ही मध्ययुग के अन्त में, अंग्रेज़ी व्यवहारवाद, फ़्रांसीसी बुद्धिवाद और सुधारआन्दोलन की निजी आस्था से उपजी एक निर्मिति। जिसने खोजी व्यक्ति की प्रतिष्ठा, और उदार शब्दों में कहें तो, ‘मानवीय व्यक्ति’ की प्रतिष्टा। इसीलिए यह तार्किक लगता है कि साहित्य की दृष्टि से, पूँजीवादी चिन्तन के सार व परिणाम, प्रत्यक्षवाद ने ही रचयिता के व्यक्ति को सबसे अधिक महत्व प्रदान किया है। साहित्यिक इतिहास के गुटकों में, रचयिताओं की आपबीतियों में, पत्र-पत्रिकाओं के साक्षात्कारों में, यहाँ तक कि साहित्यिक लोगों की स्मरण में भी रचयिता आज भी राज करता है, अपने निजी डायरियों के ज़रिये अपने कृतित्व और अपने व्यक्तित्व को एकरूप करने के लिए बेचैन। समकालीन संस्कृति में मौजूद साहित्य की छवि अत्याचार की हद तक रचयिता पर केन्द्रित है, उस का व्यक्तित्व, उसका इतिहास, उसकी पसन्द, उसके शौक़; आलोचना भी यही होती है कि बॉदलेयर का काम बॉदलेयर व्यक्ति की असफलता है, वैन गॉह का काम उसकी विक्षिप्तता, त्चैकोवस्की का उसके अवगुण: कृति की व्याख्या उस आदमी में खोजी जाती है जिसने उसे रचा है जैसे कि गल्प के कमोबेश पारदर्शी रूपक के ज़रिये ये हमेशा अन्ततः उस ही एक व्यक्ति, रचयिता, की वाणी थी जिसने उसकी गोपनीयता का उद्घाटन किया।

हालांकि रचयिता का साम्राज्य अभी भी बहुत मज़बूत है ( हालिया आलोचना ने उसे और सुदृढ ही किया है), यह ज़ाहिर है कि एक लम्बे समय से कुछ निश्चित लोगों ने उसकी चूलें हिलाने के प्रयास किए हैं। फ़्रांस में, मलाहमे सबसे पहले थे जिन्होने पूर्वानुमान लगाया और उसके पूरे विस्तार में समझा कि अभी तक आदमी जिस स्थान पर स्वामित्व का दावा कर रहा था उस आदमी की जगह पर भाषा को रखने की ज़रूरत है। मलाह्मे के लिए, और हमारे लिए भी, वो भाषा है जो बोलती है, रचयिता नहीं : लिखना पहुँचना है, एक पहले से मौजूद व्यक्तित्वहीनता के ज़रिये- यथार्थवादी उपन्यासकार की बधिया तटस्थता के ज़रिये नहीं – वह बिन्दु जहाँ भाषा मात्र ही काम करती है, ‘निष्पादन’ करती है, ‘हमारा स्वत्व’ नहीं। मलाह्मे का सम्पूर्ण काव्यशास्त्र लेखन के हित में रचयिता का दमन करने में ही निहित है (जो, हम देखेंगे, पाठक की प्रतिष्ठा की पुनर्स्थापना के लिए है।) आत्म के मनोविज्ञान को ढोते हुए वैलरी ने मलाह्मे की प्रस्थापना को नर्म तो बनाया, साथ ही आलंकारिकता के सबक़ पर शास्त्रीयता को वरीयता दे कर उन्होने रचयिता पर सवाल खड़े किए और हँसी उड़ाई, और उसकी गतिविधि के भाषिकी और ‘सांयोगिक’ प्रकृति पर ज़ोर दिया, और उनके गद्य ने लगातार साहित्य की मौखिक स्थिति का समर्थन किया जिसके सम्मुख रचयिता की हीनता की कोई भी शरण लेना उनको शुद्ध अन्धविश्वास लगा। यह साफ़ है कि स्वयं प्रुस्त ने भी, उनके विश्लेषणों के ज़ाहिरा मनोवैज्ञानिक चरित्र के बावजूद रचयिता और उसके चरित्रों के बीच के सम्बन्धों को, एक चरम सूक्ष्मता के ज़रिये, निर्दयता से धूमिल करने का काम किया : कथावाचक को एक ऐसा व्यक्ति बना कर- जो लिखेगा, न कि जो लिख रहा है, या जिसने देखा और महसूस किया। (उपन्यास का नौजवान – पर, कौन है ये, क्या उमर है इसकी? - लिखना चाहता है पर लिख नहीं पाता और उपन्यास वहाँ समाप्त हो जाता है जब अन्ततः लेखन सम्भव हो पाता है) प्रुस्त ने आधुनिक साहित्य को उसका महाकाव्य दिया है : एक मूलभूत विपर्यय के द्वारा; बजाय अपने जीवन को उपन्यास में डालने के, जैसा कि कहा जाता है, वे अपने जीवन को एक ऐसा काम बना डालते हैं जिसके लिए एक तरह से उनकी अपनी किताब एक नमूना थी, ताकि ये हम पर साफ़ज़ाहिर रहे कि ये चार्लि नहीं है जो मन्तेसकियू का अनुकरण करता है बल्कि मन्तेसकियू अपने क़िस्साई, ऐतिहासिक सच्चाई में एक गौण अंश है जो चार्लि से उपजा है। आधुनिकता के इस पूर्वइतिहास पर बने रहने के लिए अब आखिर में अतियथार्थवाद : अतियथार्थवाद बेशक़ भाषा को एक स्वायत्त दरज़ा नहीं दे सका, चूंकि भाषा एक व्यवस्था है, और इस आन्दोलन का (रूमानी) मक़सद ही सारी नियमावलियों को छिन्न-भिन्न करना था – एक आभासी छिन्न-भिन्नता, क्योंकि कोई नियमावली नष्ट नहीं की जा सकती, केवल उसके साथ खिलवाड़ किया जा सकता है; लेकिन अपेक्षित अर्थों को झटके से भंग कर के (अतियथार्थवादियों का प्रख्यात झटका), जिस चीज़ को सिर अनदेखा कर जाता है उसके लेखन की ज़िम्मेदारी शीघ्रातिशीघ्र हाथ को देकर (यह था स्वचालित लेखन), सामूहिक लेखन का सिद्धान्त और अनुभव स्वीकार कर के, अतियथार्थवाद ने लेखक की छवि को लौकिक बनाने में मदद की। और अन्त में, साहित्य की दुनिया से बाहर (वास्तव में, ये सारी भिन्नताएं लांघी जा रही हैं) भाषाशास्त्र ने बहुमूल्य वैश्लेषिक औज़ार के साथ रचयिता का विनाश सम्पन्न कर दिया है यह दिखाकर कि अपनी समूचेपन में प्रगटीकरण एक खोखली प्रक्रिया है जो उस खाली जगह पर किन्ही संभाषी व्यक्तियों को रखे बिना ही अच्छी तरह काम करती है। भाषिकी तौर पर, रचयिता कभी भी लिखने वाले से अधिक कुछ नहीं है, जैसे कि मैं, मैं कहने वाले से ज़्यादा कुछ नहीं है : भाषा एक कर्ता को जानती है, व्यक्ति को नहीं, इस कर्ता का अन्त कर दो, तो ठीक इस प्रगटीकरण के बाहर की शून्यता जो इसे परिभाषित करती है, वही काफ़ी है भाषा के ‘कर्म’ द्वारा इसे खाली कराने के लिए।

रचयिता की अनुपस्थिति (ब्रेष्ट के मामले में रचयिता साहित्यिक मंच के एक कोने में सिमट जाता है, इसे हम कह सकते हैं सचमुच का विलगाव) मात्र कोई लिखने की प्रक्रिया या ऐतिहासिक सच ही नहीं है : इस ने आधुनिक पाठ को पूरी तरह से रूपान्तरित कर दिया है। (या – जो कि एक ही बात है – अब पाठ ऐसे लिखा और पढ़ा जाता है कि उस में से, हर स्तर पर, रचयिता स्वयं को अनुपस्थित कर लेता है) समय, सबसे पहले, भी वह नहीं रहा। रचयिता, जब हम उस पर भरोसा करते हैं, की कल्पना हम उसकी किताब के भूतकाल की तरह करते हैं : किताब और रचयिता अपने आप ही एक ही रेखा में अपनी जगह लेते हैं, पूर्व और पश्चात के रूप में, रचयिता से अपेक्षित होता है कि वह किताब को भोजन दे – मतलब कि, वह पहले होता है, सोचता है, उसके लिए जीता है; अपने काम के साथ पूर्ववर्ती होने का वह वही सम्बन्ध निभाता है जो एक पिता अपने बच्चे के साथ। इसके ठीक विपरीत, आधुनिक लेखक (लिपिक) अपने पाठ के साथ ही जन्मता है। किसी भी तौर पर उसे ऐसी कोई हस्ती नहीं मिलती जो उसके लेखन से पहले से हो और बढ़ कर भी हो, वह किसी भी तौर पर वह कर्ता नहीं है जिसका कि उसकी किताब कथन है, प्रगटीकरण के अलावा कोई दूसरा समय नहीं है, और हर पाठ शाश्वत रूप से अभी और यहीं लिखा जाता है। यह इसलिए है (या : इसके परिणाम स्वरूप है) अब लेखन का अर्थ अभिलेखन, अवलोकन, निरूपण, चित्रण की प्रक्रिया (जैसे कि शास्त्रीय लेखक कहते हैं) नहीं हो सकता, बल्कि जिसे भाषाशास्त्री, ऑक्सफ़ोर्ड स्कूल की शब्द सम्पदा का अनुकरण करते हुए, निष्पादात्मक कहते है, एक विरल क्रियात्मक रूप (विशिष्ट रूप से केवल प्रथम पुरुष और वर्तमान काल के लिए सुरक्षित) जिसमें कि प्रगटीकरण में कोई और कथ्य नहीं, सिवा उस क्रिया के जिस के द्वारा वह प्रगट किया गया : पूर्वकालिक चारणों की चरणवन्दना की तरह ; आधुनिक लेखक, ‘रचयिता’ को दफ़नाने के बाद अब यह मान नहीं सकता, अपने पूर्ववर्तियों की दयनीय नज़रिये की तरह, कि उसका हाथ उसके विचारों और आवेगों के लिए बहुत मन्द है, जिसके परिणामस्वरूप, आवश्यक्ता को नियम में ढालते हुए, उसे इस अन्तराल को भरना होगा और अनन्तकाल तक अपने शिल्प का मांजना होगा; इसके विपरीत उसके लिए, उसका हाथ किसी भी वाणी से स्वतन्त्र होकर, अंकण (अभिव्यक्ति नहीं) की एक शुद्ध चेष्टा से भरा हुआ, खींचता है एक निर्मूलक क्षेत्र – या जिसका, कम से कम, सिवा भाषा के और कोई मूल नहीं, यानी कि वही एक तत्व जो लगातार हर उत्पत्ति पर प्रश्न उठाती चलती है।

हम जानते हैं कि कोई पाठ सिर्फ़ शब्दों की एक पंक्ति भर ही नहीं होता, जिस से मात्र एक ‘धर्मशास्त्रीय’ अर्थ (लेखकीय ईश्वर का संदेश) निकले बल्कि होता है कई पहलुओं वाला एक आयाम, जिस में तमाम तरह के लेख जड़े और लड़े होते हैं, और जिन में कोई भी मौलिक नहीं होता : संस्कृति के हज़ार मुखों से निकला, पाठ उद्धरणों का एक तन्तु है। हमेशा के नक़लची बूवा और पेक्यूशे की तरह, एक साथ ही उदात्त और हास्यास्पद दोनों और जिनकी गहन निरर्थकता लेखन के सच को ठीक-ठीक दिखाती है, लेखक केवल हमेशा अपनी पूर्ववर्ती चेष्टा की नक़ल भर कर सकता है, मौलिक कभी नहीं हो सकता; उसकी सारी सामर्थ्य विभिन्न प्रकार के लेखन का मिश्रण करने में है, और एक को दूसरो के विरुद्ध खड़ा करने में है, ताकि उसे कभी किसी एकमात्र पर ही निर्भर न हो जाना पड़े; अगर वह स्वयं को अभिव्यक्त करना चाहता है, तो कम से कम उसे पता होना चाहिये कि वह आन्तरिक ‘तत्व’, जिसका वह ‘रूपान्तरण’ करने का दावा करता है, अपने आप में एक पहले से तैयार शब्दकोष है जिसके शब्दों की व्याख्या (परिभाषा) केवल दूसरे शब्दों के द्वारा ही की जा सकती है, और दूसरे शब्दों की और दूसरे शब्दों से, और ऐसे ही अनन्त काल तक :, ग्रीक भाषा में विशेष प्रतिभा सम्पन्न, नौजवान डि क्विन्सी का एक अनुकरणीय अनुभव हमारे सामने है, ऐसा बॉदलेयर बताते हैं कि, उस मृत भाषा में कुछ विशेष अत्याधुनिक विचारों और छवियों का अनुवाद करने के लिए, “उन्होने तैयार किया शुद्ध साहित्यिक विषयों के अश्लील धैर्य से उपजने वाले से भी अधिक विस्तृत और जटिल एक शब्दकोष” (पैरादिस आर्तिफ़िसियल)। रचयिता के परवर्ती होने के बाद, लेखक आवेग, परिहास, भाव, छाप, अपने भीतर नहीं रख सकता बल्कि रखता है वह विशाल शब्दकोष जिससे वह हासिल करता है लेखन, जो न रुकता है और न खत्म होता है ; जीवन किताब की नक़ल करने से अधिक कुछ नहीं करता और किताब स्वयं किसी खोये हुए, अनन्त दूरी पर स्थित, संकेतों का तन्तु है।

एक बार जब रचयिता विदा हो गया, तो पाठ के रहस्योद्घाटन का दावा भी बिलकुल अर्थहीन हो जाता है। किसी पाठ को एक रचयिता के हवाले करना उस पाठ को एक सीमा में बाँधना है, उसको एक अन्तिम अर्थ तक पहुँचा कर लेखन को समाप्त करना है। यह परिकल्पना आलोचना को बिलकुल जंचती है, जो अपने लिए पाठ के पीछे से रचयिता की खोज (या उसकी प्रस्थापनाएं : समाज, इतिहास, अन्तर्मन, स्वतन्त्रता) का एक बड़ा बीड़ा उठा सकती है: एक बार जब रचयिता की खोज हो गई तो पाठ की व्याख्या भी हो जाती है और आलोचक विजयी होता है; इसलिए ये ज़रा भी आश्चर्य की बात नहीं कि ऐतिहासिक तौर पर रचयिता का युग आलोचक का भी युग हो, और आलोचना (“नई आलोचना” भी) को भी रचियता के साथ उखाड़ फेंकना चाहिये। लेखन की बहुलता में, वास्तव में, हर एक की विशिष्टता है पर व्याख्या किसी की नहीं; संरचना जारी रह सकती है, अपनी चरणों के सारी पुनरावृतियों में (किसी मोज़े के तरह) बिनी हुई, मगर जिसके नीचे कोई धरातल नहीं है; लेखन के आयाम से गुज़रा जा सकता है उसे भेदा नहीं जा सकता : लेखन लगातार अर्थ को स्थान देता है लेकिन हमेशा बिला जाने के लिए : लेखन, अर्थ के एक व्यवस्थाबद्ध विमोचन की ओर बढ़ता है। और इस रास्ते से साहित्य (वैसे अब से लेखन कहना अच्छा होगा), पाठ को कोई रहस्य, या उसका परम अर्थ, देने से इन्कार कर के, एक ऐसी गतिविधि को मुक्ति प्रदान करता है जिसे धर्मशास्त्र विरोधी कहा जा सकता है, और सच में क्रांतिकारी, क्योंकि अर्थ को जड़ करने से इन्कार करना ईश्वर और उसके प्रस्थापनाओं तर्क, विज्ञान और विधि से इन्कार करना है।

चलिये बालज़ाक के वाक्य पर वापस लौटते हैं : वह किसी का (यानी किसी व्यक्ति का) कथन नहीं है : इस वाणी के स्रोत का पता नहीं चलता; फिर भी सब कुछ समझ में आता है; वह इसलिए कि लेखन का असली बिन्दुपथ पठन है। इसे एक और विषेश उदाहरण से समझते हैं : हालिया शोधों (जे पी वेरनाँ) ने ग्रीक त्रासदी के मूलभूत श्लेषात्मक स्वभाव पर प्रकाश डाला है, उनका पाठ ऐसे शब्दों से बुना हुआ है जो द्विअर्थी हैं, पर हर चरित्र उनका एक ही अर्थ लेता है (त्रासदी का अर्थ, लगातार होने वाली ऐसी ही ग़लतफ़हमी से ही है); फिर भी कोई है जो हर शब्द को उसके द्वैधता में समझता है, और यह भी कहा जा सकता है कि अपने सामने खड़े चरित्रों के बहरेपन को भी समझता है : यह कोई और नहीं पाठक है (यहाँ दर्शक)। इस तरह से लेखन के सारा अस्तित्व सामने आ जाता है : एक पाठ के भीतर कई लेख होते हैं विभिन्न संस्कृतियों से आए और एक दूसरे के साथ संवाद में, विद्रूप में, और संघर्ष में संलग्न; लेकिन एक जगह है जहाँ ये सारी विविधता एकत्र होती है, एकजुट होती है, और यह जगह रचयिता नहीं है, जैसा कि हम अभी तक कहते आ रहे हैं कि थी, बल्कि पाठक है। पाठक ही वह आयाम है जहाँ किसी भी लेखन के भीतर के सारे उद्धरण, बिना खोये अंकित होते हैं; किसी भी पाठ की एकता उसके उद्गम में नहीं बल्कि उसके गन्तव्य में है; लेकिन वह गन्तव्य अब निजी नहीं रह सकता ; पाठक एक ऐसा आदमी है जिसका कोई इतिहास नहीं, कोई जीवनी नहीं, कोई मनोविज्ञान नहीं; वह मात्र एक कोई है जो पाठ के भीतर निर्मित विभिन्न राहों को एक क्षेत्रीय इकाई में थामे रखता है। इसीलिए पाठक के अधिकारों के स्वनियुक्त और पाखण्डी हिमायतियों द्वारा, मानवतावाद के नाम पर, नवलेखन की निन्दा करना बिलकुल अनर्गल है। शास्त्रीय आलोचना का सरोकार कभी भी पाठक नहीं रहा है; उसके लिए साहित्य में लिखने वाले के अलावा दूसरा कोई है ही नहीं। इस तरह के अन्तरविरोधी जुमलों का कपट अब नहीं चल सकता जिनके ज़रिये हमारा सभ्य समाज गर्व से उनकी हिमायत करता है जो उसी के द्वारा अस्वीकृत हैं, उपेक्षित हैं, जिनका गला घोटा जाता है और नष्ट किया जाता है; हम जानते हैं कि लेखन के भविष्य की प्रतिष्ठा के लिए, हमें उसके मिथक को उलटना होगा ; पाठक के जन्म की फ़िरौती रचयिता को अपनी मृत्यु से चुकानी होगी।
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20.10.09

एक अद्भुत लेखक से परिचय

ऑरहे लुइस बोर्ग़्हेस* का रचना संसार एक ऐसा विद्वतापूर्ण जटिल और सघन दलदल है जिसमें आप उतरने से क़तरा सकते हैं। पहले वाक्य से ही वो आप को डरा सकता हैं आतंकित कर सकता है अनजाने नामों, सन्दर्भों और लोकों से। लेकिन उस साहसी पाठक के लिए जो न घबराया- न डरा, ये कहानियां बौद्धिक आनन्द का उम्दा ईनाम है।

बोर्ग़्हेस की रचनाओं के बारे में यह तय काना मुश्किल होता है कि वे दार्शनिक संवाद है जिनके भीतर कहानी के अद्भुत तत्व विद्यमान हैं या फिर वे कमाल की कहानियां हैं जो गहरे दार्शनिक अर्थों से लबरेज़ हैं।

आम तौर पर कहानियां ऐसी होती हैं कि आप एक पंक्ति का एक शब्द पढ़कर नीचे उतरते चले जाइये, सुपरमैन की तरह सुपरस्पीड से पढ़ते हुए। लेकिन बोर्ग़्हेस की कहानी में कोई वाक्य कूद कर आगे नहीं जा सकते। हर वाक्य एक नया आयाम उद्घाटित करता है। एक नयी परत खोलता है। पुराना अर्थ तोड़ता है, एक नया अर्थ जोड़ता है।

बौद्धिक तेज से चमचमाती ये कहानियां पढ़ कर ऐसा लगा जैसे कि बीस वर्ष पहले के दौर में लौट गया हूँ जब पहली बार मिलान कुन्देरा पढ़कर या बुनुएल की फैन्टम ऑफ़ लिबर्टी और ओब्सक्योर ऑबजेक्ट ऑफ़ डिज़ायर देखकर एक बौद्धिक सनसनी हुई थी। शायद काफ़्का के बाद बोर्ग़्हेस दुनिया के अकेले ऐसे लेखक होंगे जिन्होने अपने समय को सबसे अधिक प्रभावित किया।

बोर्ग़्हेस पोस्ट-मार्डनिस्म के अस्तित्व में आने से पहले ही वे एक पोस्ट-मार्डनिस्ट थे। वे यथार्थवादी नहीं बल्कि अल्ट्राइस्ट थे। उनका यथार्थ जैसा यथार्थ नहीं है, और स्वप्न ठीक ठीक स्वप्न ही है यह नहीं माना जा सकता है। दोनों एक दूसरे में घुलते हुए से हैं। कब स्वप्न की तरलता यथार्थ की तरह ठोस हो जाए और यथार्थ का घनत्व पिघल कर कैसा अचरजी रंग बदल ले आप तय नहीं कर सकते। उनकी हर कहानी कुछ विशेष विषय के गिर्द ही चलती है - अनन्त, असीम, भ्रम, माया, स्वप्न, परतदार सत्य, लैबीरेन्थ (जटिल भूलभुलैया या सघन गोरखी दुनिया), समय; वर्तुलाकार या चक्राकार समय।


उनकी एक मशहूर कहानी है -पियर मेनार, ऑथर ऑफ़ द ‘कीहोटि’। लेखकीय मौलिकता के ऊपर ऐसी मौलिक कहानी पहले नहीं पढ़ी थी। यह एक ऐसे लेखक की कथा जो सरवान्तीज़ के डॉन कीहोटि की पुनर्रचना में कुछ इस तरह जुटता है कि उसका एक एक लफ़्ज़ सरवान्तीज़ के साथ मेल खाता है मगर विश्लेषक या पाठक के लिए उसके अर्थ भिन्न हो जाते हैं क्योंकि उनकी देश काल परिस्थिति भिन्न है।

मिसाल के तौर पर एक और कहानी है ‘लाइब्रेरी ऑफ़ बेबेल’, जिसमें लाइब्रेरी ब्रह्माण्ड का एक रूपक है- ये अनन्त लाइब्रेरी एक विशाल खगोल है जो अनगिनत षटभुजों से मिलकर बनी है, जिसका केद्र तो हर एक षटभुज है पर परिधि कहीं नहीं। लाइब्रेरी सम्पूर्ण है, जिस में एक जैसी कोई भी दो किताबें नहीं हैं। और उसकी आलमारियों में २२ लेखन चिह्नों के सभी समुच्च्य मौजूद हैं। चूंकि लाइब्रेरी में सभी सम्भव लेखन उपस्थित है इसलिए दुनिया की हर समस्या, निजी और सामाजिक का हल लाइब्रेरी के किसी न किसी कोने में रखी किसी किताब के भीतर लिखा हुआ है। और इन्ही किताबों के बीच एक ऐसी किताब भी है जो कि है सम्पूर्ण किताब, जो कि बाक़ी सभी किताबों की कुंजी- सभी किताबों के रहस्य अपने भीतर छिपाये हुए है। बावजूद इस सब के लाइब्रेरी में अशांति है, अराजकता है, हताशा है..कुछ लोग किताबें जला रहे हैं, कुछ उस दिव्य किताब की खोज में विचित्र प्रयोग कर रहे हैं।

बोर्ग़्हेस की कहानियों के भीतर के कल्पनालोक में काल्पनिक लेखकों की काल्पनिक किताबें होती हैं एक नहीं तमाम। ऐसा माना जा सकता है कि ये सारी किताबें वो किताबें है जो बोर्ग़हेस स्वयं लिखना चाहते थे चूंकि उनका मानना है कि पांच सौ पन्नो की किताबें लिखने की मशक्कत एक ऐसा व्यर्थ का पागलपन जो आप के बहुमूल्य समय पर डाका डालता है, जबकि वही बात आप पांच मिनट में मुँहज़बानी सुना सकते हैं। बेहतर ये है कि मान लिया जाय कि वो किताबें पहले ही लिखीं जा चुकी हैं और सिर्फ़ उन पर टिप्पणी लिखी जाय।

पेंग्विन ने उनकी कहानियों के सारे संग्रह छापे हैं। लेकिन सबसे बेहतरीन कहानियां ‘फ़िक्शन्स’ नाम के संग्रह में संकलित है। अगर आप कहानियों के घिसे-पिटे सुर से ऊब चुके हैं तो ज़रूर आज़माईये बोर्ग़्हेस को- नाउम्मीद नहीं होंगे।




*Borges के उच्चारण को लेकर भी एक विविधता है- जो उन पर जंचती है। हिन्दी भाषी लोग इसे आम तौर पर बोर्जेस पढ़ेंगे मगर अगर आप Borges के हिन्दी अनुवाद देखेंगे तो आप को वहाँ बोर्ख़ेस लिखा मिलेगा-हिन्दी के विद्वजन भी यही उचारते मिलेंगे। G किस नियम के अनुसार ख़ में बदल जाएगा, को लेकर मेरे भीतर एक हलचल मची रही। मैंने डिक्शनरी डॉट कॉम पर देखा तो वहाँ उचारण मिला- ऑरहे लुइस बोर्हेस। यह सही भी है क्योंकि स्पेनी फ़िल्मों में Jorge (George) को ऑरहे ही बोला जाता है। लेकिन जब मैं इसे बातचीत में बोरहेस-बोरहेस बोलने लगा तो उलझन सी होने लगी। G की छवि को ह की तरह बोलने में तक़लीफ़ हो रही है बावजूद इसके कि प्रसिद्ध चित्रकार Modigliani को हम मोदिहलियानी ही कह कर बुलाते सुन सकते हैं। फिर मेरी पत्नी तनु ने मुझ से कहा कि बोरहेस का जो ह है वह हलक़ से निकलना चाहिये, अरबी के हलक़ वाले हे की तरह। मैंने बोलकर देखा- बेहतर लगा। फिर भी मुझे सन्तोष नहीं हुआ। फिर ख्याल आया कि G को ग भी तो बोला जा सकता है और उसे अगर ग़ैन वाले ग़ की तरह बोला जाय तो कैसा रहे? तो हुआ बोरग़ेस मगर डिक्शनरी डॉट कॉम का उच्चारण इससे मेल नहीं खाता। लिहाज़ा मैंने दोनों को मिला दिया और पाया – बोर्ग़्हेस। ये काफ़ी कुछ असली उच्चारण के क़रीब है।