गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

रेसिज़्म का हल्ला

निदो की मौत के पहले का घटना क्रम जो इस रपट से बनता है उस पर ज़रा गौर किया जाय: 

१॰ निदो दुकान पर जाकर पता पूछता है, वो उस पर कुछ कमेंट करते हैं 
२॰ निदो दुकान में इतनी तोड़फोड़ करता है कि पुलिस की मध्यस्थता के बाद वो ७७००₹ देने को राज़ी हो जाता है। (ज़ाहिरन हत्या के मुलज़िमों ने पुलिस को बुलाया)
३॰ निदो अपने कुछ और दोस्तों के साथ वापस घटना स्थल पर आता है। निदो के हत्या के मुलज़िम पुलिस को फोन करते हैं (दुबारा)। पुलिस वाले आकर फिर बीच बचाव करते हैं। निदो की माँ को फोन करते हैं। माँ कहती हैं कि निदो को उसके लोक गारजियन के पास छोड़ा जाय।
४॰ निदो थाने जाकर अपने एक दोस्त को ही लोकल गारजियन बताकर वहाँ से चला जाता है।
५॰ अगले दिन निदो की मौत हो जाती है।
६॰ शव परीक्षा के बाद किसी बाहरी चोट से मौत मुमकिन नहीं लगती। सब मामूली चोटे हैं।

ये आज की ख़बर है। पर निदो की मौत के पहले दिन से ही फेसबुक के सजग प्रहरियों ने इस पूरे मामले को रेसिज़्म से प्रेरित बताया और मीडिया ने भी। माफ़ करें साहब मुझे तो इसमें रेसिज़्म नहीं समझ आता। झगड़े, मारपीट, हत्याएं देश भर में होती हैं। विभिन्नताओं का देश है। ये कैसे मुमकिन है कि हिन्दू हिन्दू से लड़े, जैन जैन से, और मणिपुरी मणिपुरी से? सब को एक दूसरे से लड़ने का ईश्वरीय हक़ मिला हुआ है। निदो १९ साल का जवान ख़ून, जोश से इतना उबल रहा था कि न उसे किसी की सम्पत्ति की परवाह थी और न पुलिस-क़ानून की। ये भी ध्यान रखना चाहिये कि वो एक एम एल ए का बेटा था, हमारे देश मेँ इनकी एल अलग क़ौम बन चुकी है। हो सकता है हत्या के मुलज़िमों ने कोई ऐसी बात कही हो जो रेसिज़्म से प्रेरित हो, मगर क्या इस तरह की हिंसा से रेसिज़्म का हल किया जाएगा, जिसका परिचय निदो ने दिया?

मेरी समझ में तो ये एक ऐसी मानसिकता का मामला है जिसमें आप हर बात का जवाब हिंसा से देना चाहते हैं। और ऐसी मानसिकता हर समाज में आपराधिक कहलाती है, चाहे वो अरुणाचल के एम एल ए का बेटा करे या लाजपत नगर का एक पनीर वाला।

लेकिन मेरे तमाम दोस्तों और मीडिया ने इस मामले का ऐसा रंग बदला कि हमेशा चुप रहने वाले प्रधानमंत्री तक को बोलना पड़ा। वे इसे अपनी सफलता मान सकते हैं। पर मेरी समझ से ये दुखद है। मेरे दोस्त पहले भी इस तरह की ग़लतियां करते रहे हैं। ख़ुर्शीद अनवर के मामले में भी मित्रों ने बिना सोचे समझे उनके विरुद्ध कैम्पेन शुरु कर दिया। क्यों? स्त्री के साथ खड़े होना प्रगतिशीलता है, इसलिए वो आँखमूंदकर फ़ैसले कर रहे हैं। खिड़की मामले में भी यही हुआ। वहाँ तो उन्होने एक मंत्री ही नहीं पूरे मोहल्ले को रेसिस्ट क़रार दे दिया। और अब ये निदो का केस!

क्या मिला उन्हे? उनके इस अभियान से क्या लोगों के भीतर से नस्लवाद की भावना चली जाएगी? उलटे और पनपेगी। क्योंकि आप लोगों की आँखों में उंगली डालकर उन्हे पूर्वोत्तर के लोगों को अलग चिह्नित करवा रहे हैं। और पूर्वोतर के लोगों के मन में भी जबरन एक असंतोष की भावना को बल दे रहे हैं? क्यों? अगर ये राजनीति है तो ठीक है, अच्छी नीति है। क्योंकि राजनीति लोगों को बांटकर ही होती है। 


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शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

बदलाव का संकट

दिल्ली में वैकल्पिक व्यवस्था चाहने वाले एक दल के नेता और कार्यकर्ता विकल्प की लड़ाई से बहककर नस्लविरोधी और स्त्रीविरोधी व्यवहार में पतित हो जाते हैं। बीरभूम में एक पंचायत बारह लोगों को एक स्त्री के साथ सामूहिक बलात्कार का आदेश देती है। 

क्या कारण है कि बड़ी-बड़ी बातें करने वाले दल अपने दल के नेताओं और कार्यकर्ताओं में संवैधानिक मूल्यों के प्रति कोई आस्था न पैदा कर सके? शीर्ष संवैधानिक पद पर बैठे राष्ट्रपति के अपने ज़िले में ऐसी जघन्यता पलती रही? 

क्या इसका कारण यह है कि हमारे लोग संविधान का सम्मान तो करते हैं पर इसमें निहित मूल्य और आदर्श, उनके अपने मूल्य और आदर्श नहीं हैं? क्या यह सच नहीं है कि बहुसंख्यक समाज आज भी स्त्री को हीन समझता है? क्या न्याय और दण्ड की जैसी व्यवस्था हमारे संविधान ने की है, सामाजिक कल्पना में भी वैसी ही न्याय और दण्ड की व्यवस्था है?

मेरा विचार है कि हमारा संविधान तो एकता, समानता और न्याय के प्रगतिशील मूल्यों पर आधारित है जबकि भारतीय समाज में कई स्तरों पर पिछड़ापन और पतनशीलता नज़र आती है।

मगर ये हुआ कैसे? यदि हमारा संविधान हमारे ही समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करता तो किस समाज का करता है? तो क्या सच ये है कि हमारा समाज उन प्रगतिशील मूल्यों को ढो रहा है जिन पर दिल से उसकी आस्था नहीं है?

अगर सचमुच ऐसा है तो ये एक बड़े संकट की और इशारा है- जिसमें संवैधानिक व्यवस्था में क़ानून बनाकर बदलाव तो कर दिए गए मगर सामाजिक बदलाव का पक्ष पूरी तरह उपेक्षित रहा!

तब फिर क़ानून बनाकर, लोगों को अपराधी घोषित करके, उन्हे दण्डित करके क्या हासिल होगा? आधा देश स्त्रीविरोधी, जातिवादी, साम्प्रदायिक, और न जाने किस-किस अपराध का भागीदार हो सकता है।

क्या दण्ड का डर ही बदलाव की बुनियादी शर्त है? असली बदलाव कैसे होता है? भीतर से या बाहर से? मेरी समझ में बाहर से केवल हिंसा हो सकती है, विकासमान परिवर्तन केवल भीतर से ही मुमकिन है।


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सोमवार, 20 जनवरी 2014

आआपा का समर्थन

मैं आने वाले चुनावों में आआपा का समर्थन करने का इरादा रखता हूँ!

कारण:

१। अरविन्द केजरीवाल और योगेन्द्र यादव मेरे भीतर, किसी भी अन्य राजनेता से अधिक भरोसा जगाते हैं। मुझे वे किसी भी दल के अन्य नेताओं से अधिक ईमानदार, सत्यनिष्ठ, और अपने ध्येय के प्रति समर्पित समझ आते हैं।

२। वे साम्प्रदायिक नहीं हैं। आरक्षण को लेकर उनके बारे में कुछ संशय है। मगर मैं नहीं समझता कि वो आरक्षण के ख़िलाफ़ जाने की भूल करेंगे।

३। उनकी आर्थिक नीतियां स्पष्ट नहीं हैं। मगर इन हालात में जबकि भाजपा और कांग्रेस एक ही आर्थिक नीति की हिमायती है, आआपा कम से कम अन्य बिन्दुओं के आधार पर उनसे बेहतर विकल्प लगती है। और शायद वो ऐसी आर्थिक नीति लेकर आ सके जो समाज के समान विकास करने में मददगार सिद्ध हो, ऐसी उम्मीद तो की जा सकती है!

४। वे स्वराज की बात कर रहे हैं, शासन तंत्र की निर्देश श्रंखला को ऊपर से नीचे के बदले, नीचे से ऊपर कर देने की बात कर रहे हैं- ये बड़ा मुद्दा है। अगर वो ये न भी कर सकें तो भी इस मुद्दे को फोकस में लाने के लिए ही उन्हे वोट दिया जाना चाहिये ताकि आगे लड़ाई का मुद्दा ये रहे!

५। इस समय देश में उनके पक्ष में माहौल बना हुआ है। लोग एक विकल्प खोज रहे हैं। ख़ासकर कांग्रेस का विकल्प! आआपा में कांग्रेस का असली विकल्प बनने की सारी सम्भावना मौजूद है। ये कोई क्रांतिकारी विकल्प नहीं है। आआपा सारी समस्याएं सुलझा दे- ऐसी उम्मीद करना भी व्यर्थ है- पर उसे एक अवसर दिया जाना चाहिये! देखें, वे क्या कर सकते हैं!

६। ये ठीक है कि ऐसा विकल्प बनाना आसान नहीं। दो लोगों के भरोसे विकल्प नहीं बनता। देश भर में तमाम अवसरवादी तत्व आआपा ज्वाइन कर रहे हैं। वो अपनी पुरानी संस्कृति इधर भी ले आएंगे। पर क्या कर सकते हैं? हमारे लोग जैसे हैं वैसे हैं। अगर हमारे देश के बहुत सारे लोग भ्रष्ट, अवसरवादी, और गहराई में जातिवादी और साम्प्रदायिक भी हैं- तो हैं। शुरू यहीं से करना होगा! कोई जादू की छड़ी नहीं है। या तो फिर उम्मीद छोड़ कर आदमी बस गरियाता रहे- सब साले चोर है! इस मुल्क का कुछ नहीं हो सकता!

७। हो सकता है तमाम ऐसे मामले हों जिस पर आप आआपा से सहमत न हों, मैं भी नहीं हूँ। पर ये समय असहमत होकर नए विकल्प से बनने के पहले ही टूट कर अलग हो जाने का नहीं, बन रहे विकल्प को बल प्रदान करने का है! नहीं तो जान लीजिए अगर आआपा आने वाले चुनावों में एक महत्वपूर्ण संख्या में सीटें नहीं जीत सकी तो सरकार या तो कांग्रेस की बनेगी या फिर भाजपा की!

८। चूंकि मैं कांग्रेस के शासन से तंग आ चुका हूँ और मोदी को भी इस देश के सर्वोच्च पद पर नहीं देखना चाहता, इसलिए मैं आने वाले चुनावों में आआपा को वोट देने का इरादा रखता हूँ।

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